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Friday, January 15, 2021

सामाजिक एजेंडे का हिस्सा बने पोषण (अमर उजाला)

आस्था कांत  

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस-5, 2019-2020) की रिपोर्ट हाल ही में जारी की गई है, जिसमें 22 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में बाल कुपोषण सहित विभिन्न संकेतकों की तथ्यात्मक जानकारियां दी गई हैं। 2015-16 में किए गए एनएफएचएस के पिछले दौर के सर्वे की तुलना में बच्चों में अति पोषण तथा निम्न पोषण का रुझान देखना खतरे की घंटी जैसा है। कुछ संकेतकों में थोड़ा सुधार के साथ कुपोषण को लेकर यह दोहरा बोझ है। पांच वर्ष की उम्र तक के बच्चों में पोषण की स्थिति को मापने के मुख्य संकेतक नाटापन (उम्र के अनुपात में ऊंचाई), निर्बलता (ऊंचाई के अनुपात में कम वजन), कम वजन (उम्र के अनुपात में वजन) और अधिक वजन (बॉडी मास इंडेक्स) हैं। किसी भी रूप में कुपोषण अंततः कई तरह की सहरुग्णता का कारण बनता है और दीर्घकाल में इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़ते हैं। 


22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के आंकड़े दिखाते हैं कि एनएफएचएस-4 की तुलना में 13 राज्यों में बच्चों में नाटेपन, 12 राज्यों में निर्बलता और 16 राज्यों में कम वजन की समस्या बढ़ी है। वहीं 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बच्चों में अधिक वजन के मामले बढ़े हैं। बाल स्वास्थ्य के नजदीकी निर्धारकों में से एक मातृ पोषण है, जो गर्भावस्था के परिणामों को प्रभावित करता है और बदले में बाल स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। अध्ययन बताते हैं कि बच्चे के पोषण का संबंध सीधे मां की कद-काठी, वजन और हीमोग्लोबिन के स्तर से होता है। एनएफएचएस-5 के मुताबिक 22 में से 20 राज्यों में कम वजन वाली महिलाओं की संख्या में कमी आई है, हालांकि महिलाओं में अधिक वजन और मोटापे का रुझान बढ़ा है और कई राज्यों में इसके साथ ही मां में खून की कमी का उच्च स्तर खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। 


बाल कुपोषण को प्रभावित करने वाले संबंधित संकेतकों में कुछ सुधार भी देखा गया है। पहले 1,000 दिन बच्चे के स्वास्थ्य को निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, जहां शुरुआत से स्तनपान बच्चे के पोषण का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत होता है। हालांकि स्तनपान में वृद्धि हुई है, जहां 16 राज्यों में मामूली सुधार देखा गया है, वहीं जन्म के तुरंत बाद से स्तनपान के स्तर का मिश्रित प्रदर्शन देखा गया। सभी 22 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में व्यवहार संबंधी प्रमुख संकेतकों में सुधार देखा गया है, जिनमें प्रसव पूर्व देखभाल (एएनसी), कम से कम सौ दिनों तक ऑयरन, फॉलिक एसिड की गोलियों का सेवन शामिल है। इससे पता चलता है कि केंद्र, राज्य, नागरिक समाज संगठनों और अन्य विकास सहयोगियों द्वारा विभिन्न हस्तक्षेप कार्यक्रमों ने अच्छी तरह से काम किया है। प्रसव पूर्व देखभाल से संबंधित संस्थाएं अन्य सेवाओं के लिए भी अच्छा मंच है, जहां गर्भनिरोधकों और बाल टीकाकरण से संबंधित जानकारियां दी जाती हैं। एनएफएचएस-4 की तुलना में 22 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में 12 से 23 महीने के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण में 80 फीसदी तक की वृद्धि देखी गई है।


इन सकारात्मक संकेतकों को मातृ-कल्याण के संकेतकों से जोड़ा जा सकता है, जैसे कि महिलाओं की 10 साल से अधिक की स्कूली शिक्षा और कम उम्र में होने वाले विवाह में कमी, जिनमें एनएफएचएस-5 में भी सुधार हुआ है। बच्चे के स्वास्थ्य के निर्धारण में सामाजिक-पारिस्थितिकी कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, सारे राज्यों में स्वच्छता सुविधाओं और पीने के पानी के स्रोत में 2015-16 की तुलना में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। एनएफएचएस-5 के निष्कर्ष दिखाते हैं कि भारत को लगातार विभिन्न कार्यक्रमों और नीतियों के जरिये पोषण को प्राथमिकता में रखना होगा। कोविड-19 के कारण आई बाधाओं ने भारत की स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ डाला है, जिसका असर कुपोषण के खिलाफ लड़ाई पर भी पड़ा है। 


(लेखिका हार्वर्ड टी एच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ, इंडिया रिसर्च सेंटर में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं )  

सौजन्य - अमर उजाला।

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