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Saturday, January 9, 2021

बंगाल में दीदी के लिए अस्तित्व की लड़ाई, पांच साल पहले किसने ऐसा सोचा था (अमर उजाला)

नीरजा चौधरी 


पांच साल पहले किसने कल्पना की होगी कि ममता बनर्जी को वर्ष 2021 में अपने अस्तित्व के लिए जूझना होगा? पश्चिम बंगाल का यह इतिहास है कि सत्ता में रहने वाली पार्टियां तीन दशकों तक सत्ता में रहती हैं। किसने सोचा होगा कि ममता पर हमला वामपंथियों की ओर से नहीं, बल्कि भाजपा की तरफ से होगा, जो दो दशकों से इस पूर्वी राज्य में पांव जमाने की कोशिश कर रही है? या कि वामपंथी दल और कांग्रेस, जो पांच दशकों से एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं, अपना अस्तित्व बचाने के लिए एक-दूसरे से हाथ मिलाएंगे?


और किसने कल्पना की होगी कि असदुद्दीन ओवैसी की छोटी-सी क्षेत्रीय पार्टी एआईएमआईएम कांग्रेस को मुसलमानों, खासकर युवा मुसलमानों को लुभाने के मामले में मात देगी, जो सोचते हैं कि जब सभी दलों ने उन्हें छोड़ दिया है, तो कम से कम वह तो उनके अधिकारों के लिए बोल रही है! बिहार के सीमांचल क्षेत्र में विधानसभा की पांच सीटें जीतकर और भाजपा द्वारा उन पर जबर्दस्त निशाना साधने के बावजूद हैदराबाद नगरपालिका के चुनावों में अपनी पकड़ बनाए रखने के साथ अब वह पश्चिम बंगाल की लड़ाई के लिए तैयार है। या इस बारे में किसने सोचा होगा कि भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी शिवसेना परोक्ष रूप से ममता के लिए बल्लेबाजी करेगी, जिसने भाजपा की तरफ जाने वाले हिंदू वोटों की कटौती की उम्मीद में पश्चिम बंगाल में अपने प्रत्याशी उतारने का फैसला किया है। पश्चिम बंगाल में, जहां तीन महीने बाद चुनाव होने हैं, नए गठजोड़ और जमीनी स्तर पर बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। राज्य में बढ़ती हिंसा की घटनाएं भी बताती हैं कि पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ जान-बूझकर गुंडागर्दी कर रही हैं। और इस लड़ाई में कुछ भी हो सकता है। लेकिन एक बात तय है कि मुख्य लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच होने वाली है। वामपंथी दल और कांग्रेस की स्थिति खराब हो सकती है।

पश्चिम बंगाल में 27 से 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जिस पर तृणमूल, वाम दल, कांग्रेस और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम दावा जताने जा रही हैं। राज्य आज हिंदू-मुस्लिम लाइन पर ध्रुवीकरण के लिए अति संवेदनशील है, जो इन दिनों हो रहा है। उतने ही यकीन के साथ यह भी कहा जा सकता है कि भाजपा राज्य में प्रबल ताकत है और ममता बनर्जी बैकफुट पर हैं। भाजपा, जिसने 2016 के विधानसभा चुनाव में 294 में से मात्र तीन सीटें जीती थीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतने में सफल रही। यानी 125 विधानसभा क्षेत्रों में उसे बढ़त है और उसका वोट शेयर 40 फीसदी है। ममता की तृणमूल ने 22 लोकसभा सीटें जीती और उसे 44 फीसदी वोट मिले। इसलिए लोकप्रिय वोट में चार-फीसदी की बढ़त भाजपा के लिए निर्णायक होना चाहिए।


भाजपा के विरोधी दलील देते हैं कि मोदी के मुख्य प्रचारक होने पर राष्ट्रीय चुनाव में 40 फीसदी वोट पाना आसान है, लेकिन राज्य के चुनाव में स्थिति बदल सकती है। क्या भाजपा विधानसभा चुनाव में अपने 40 फीसदी वोट को बरकरार रख पाएगी, जब स्थानीय मुद्दों पर चुनाव होंगे? तृणमूल के पास ममता दीदी का चेहरा होने का भी फायदा है, लेकिन भाजपा के पास राज्य में कोई जाना-माना चेहरा नहीं है। यह तर्क भी दिया जाता है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में चुनाव हुए थे, वहां 2019 के नतीजों को दोहराया नहीं गया, चाहे वह हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, दिल्ली या बिहार हो। 


लेकिन भाजपा तुरंत यह तर्क देती है, दिल्ली को छोड़कर (जहां अरविंद केजरीवाल फिर से चुने गए) उनकी पार्टी अन्य राज्यों में सत्ता में होने के कारण सत्ता-विरोधी रुझानों से जूझ रही थी। लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा नहीं है। वहां ममता बनर्जी को सत्ता विरोधी रुझान से जूझना है। और भाजपा ने उनके भ्रष्टाचार (नारद, शारदा, अवैध कोयला खनन), बिगड़ती कानून-व्यवस्था, कोविड संकट से निपटने के तरीके, और अल्पसंख्यकों के 'तुष्टिकरण' के खिलाफ हमला किया है। इसके अलावा भाजपा के पास एक विशाल और कुशल चुनावी मशीनरी है, जिसे उसने पूर्वी राज्य में काम पर लगा दिया है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की रणनीति का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, हर जगह तृणमूल विधायकों को अपने पक्ष में करना, खासकर उन्हें, जिनकी ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी पकड़ है। वह उन्हें सावधानी के साथ चुन रही है और दबाव का इस्तेमाल करते हुए उनकी नाराजगी से खेल रही है, यानी उन्हें अपने पाले में लाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना रही है। 2017 में उसने ममता बनर्जी के करीबी मुकुल राय को अपने पक्ष में मिलाया था। वर्ष 2020 में शुभेंदु अधिकारी और उनके भाई भाजपा में शामिल हुए। आने वाले दिनों में तृणमूल से निकलने वालों की संख्या बढ़ सकती है। हाल के दिनों में कई मंत्रियों ने कैबिनेट बैठकों में भाग नहीं लिया है, जो ममता के लिए एक अशुभ संकेत है।


इसके अलावा राज्य में दक्षिणपंथी रुझान बढ़ रहा है, जिससे भाजपा को फायदा हो रहा है। मार्क्सवादियों से बढ़त पाने के लिए ममता ने दो दशक तक उनके खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और 'मा, माटी, मानुष' का नारा दिया। आज ममता लोकलुभावन घोषणाएं कर नुकसान को रोकने की कोशिश कर रही हैं-महंगाई भत्ते में तीन फीसदी की बढ़ोतरी, स्कूलों और मदरसों, दोनों में उच्चतर माध्यमिक छात्रों को मुफ्त टैबलेट, कोविड के लिए आरटी-पीसीआर जांच की लागत को कम करना। तृणमूल ने चुनावी लड़ाई को 'बंगाली बनाम बाहरी' की लड़ाई बनाना चाहा। लेकिन अब तक ममता का उप-राष्ट्रवाद का आह्वान, या माटी के लाल या बंगाली गौरव की अपील काम नहीं कर पाई है। 


पश्चिम बंगाल लंबे समय से भाजपा के निशाने पर है और उसके नेतृत्व ने राज्य में भारी ऊर्जा खपाई है। उनके लिए पश्चिम बंगाल केवल पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों का द्वार नहीं है और न ही महज एक राज्य पर कब्जा करने का मामला है, जो कि पूरे भारत में भाजपा का वर्चस्व स्थापित करने में उसकी मदद करेगा। निस्संदेह ये महत्वपूर्ण विचार हैं। लेकिन प. बंगाल जीतना एक अन्य कारण से महत्वपूर्ण हो सकता है-ममता बनर्जी नामक साहसी और दृढ़ निश्चयी नेता पर बढ़त पाना, जिसने विपक्ष के किसी अन्य नेता की तुलना में भाजपा को जमीनी स्तर पर ज्यादा कड़ी टक्कर दी है। बहरहाल प. बंगाल का खेल अभी खुला है।

सौजन्य - अमर उजाला।

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