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Friday, January 15, 2021

पुरानी पीढ़ी से अलग पाकिस्तानी युवा, जानिए क्यों ऐसा कह रही हैं मरिआना बाबर (अमर उजाला)

मरिआना बाबर  

दुनिया के कई हिस्सों के चिकित्सा विशेषज्ञ हैरान हैं कि पाकिस्तान कोविड-19 को काफी हद तक नियंत्रित करने में कैसे कामयाब रहा और यहां अब तक अन्य देशों जैसी तबाही नहीं देखी गई। इसका एक कारण यह बताया जा रहा है कि देश में 60 फीसदी से अधिक आबादी युवाओं की है, हालांकि इसकी कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं की गई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 64 फीसदी युवाओं की उम्र 30 साल है और 29 फीसदी पाकिस्तानी 15 से 29 साल के हैं। कम से कम 2050 तक देश में जनसांख्यिकी का यही पैटर्न रहेगा। मेरी राय है कि देश के इन युवाओं का एक और सकारात्मक काम के पीछे योगदान है। यह काम पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों और समाज के भीतर चरमपंथी घटनाओं से संबंधित है। मुझे लगता है कि पाकिस्तानी युवाओं की वजह से ही यह संभव हो पाता है कि जैसे ही अल्पसंख्यकों के खिलाफ कोई घटना होती है, सोशल मीडिया पर इसकी निंदा करते हुए सरकार की कड़ी आलोचना की जाती है, नतीजतन स्थानीय सरकारें हमलावरों को गिरफ्तार और दंडित करने के लिए तुरंत कार्रवाई करती हैं। यह याद रखना होगा कि पाकिस्तान के मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व और समाज के अन्य नेताओं का जन्म विभाजन के बाद हुआ है। वे पुरानी पीढ़ी की तरह, जो विभाजन से जुड़ी दुखद घटनाओं को आज भी नहीं भूल पाए हैं, अतीत का बोझ नहीं ढोते। 


ज्यादातर कैबिनेट मंत्री पचास साल या उससे कम उम्र के हैं तथा विभिन्न राजनीतिक दलों के नए नेता भी काफी युवा हैं। इतिहास में देखें, तो हर धर्म के पूजास्थलों को नष्ट किया गया है और पाकिस्तान समेत कई देशों में यह तांडव आज भी जारी है। जब मुझे पता चलता है कि किसी धर्म के पूजास्थल पर हमला किया गया है, तब व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी दुख होता है, क्योंकि ये शांति और सहिष्णुता के स्थान हैं और किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते। पिछले दिनों जब एक हिंदू मंदिर पर हमला हुआ, तो तुरंत ही प्रधानमंत्री इमरान खान, प्रधान न्यायाधीश और मानवाधिकार मंत्री डॉ शिरीन मजारी समेत कई मंत्रियों ने इसकी निंदा की। भीड़ को रोकने में विफल रहा स्थानीय प्रशासन अब जल्द से जल्द मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। तुरंत ही लाखों पाकिस्तानी युवा सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए और उन्होंने ट्वीट कर हमले की निंदा की तथा सरकार से तुरंत हालात पर अंकुश लगाने के लिए कहा। 


यह हमला प्रांतीय राजधानी पेशावर से करीब सौ किलोमीटर दूर करक शहर के एक मंदिर पर हुआ था, जहां श्री परमहंस जी महाराज की समाधि है। इमरान खान ने इस पर ट्वीट किया कि 'मैं अपने लोगों को चेतावनी देना चाहता हूं कि पाकिस्तान में किसी ने भी अगर हमारे गैर-मुस्लिम नागरिकों या उनके पूजा स्थलों को निशाना बनाया, तो उससे सख्ती से निपटा जाएगा। अल्पसंख्यक इस देश के समान नागरिक हैं।' धार्मिक मामलों के मंत्री और मानवाधिकार मंत्री ने भी ट्वीट कर भीड़ द्वारा हिंदू मंदिर को निशाना बनाने  की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि खैबर-पख्तुनख्वा सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि दोषियों को न्याय के दायरे में लाया जाएगा। डॉ शिरीन मजारी ने ट्वीट किया, मानवाधिकार मंत्रालय भी इस पर कदम उठा रहा है। एक सरकार के रूप में हमारे सभी नागरिकों एवं उनके पूजा स्थलों की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है। 


आलोचना की शुरुआत सबसे पहले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से हुई, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने घटना का स्वतः संज्ञान लिया और अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, पुलिस महानिरीक्षक और खैबर पख्तुनख्वा के मुख्य सचिव को इस घटना के बारे में रिपोर्ट जमा करने का निर्देश भी दिया। प्रधान न्यायाधीश पाकिस्तान हिंदू परिषद के मुख्य संरक्षक डॉ रमेश कुमार से भी मिले। सुप्रीम कोर्ट ने खैबर-पख्तुनख्वा सरकार को निर्देश दिया कि वह विध्वंस के पीछे के प्रमुख संदिग्धों में से एक मौलवी शरीफ से राशि वसूल कर मंदिर का पुनर्निर्माण कराए। 


हिंदू समुदाय द्वारा मंदिर का विस्तार करने की खबर को मंदिर पर हमले की वजह बताया गया। अफवाह फैली कि हिंदू समुदाय उस जमीन पर भी कब्जा कर रहा है, जो उसकी नहीं है। दरअसल सरकार द्वारा हिंदुओं को इस्लामाबाद में एक नया मंदिर बनाने की अनुमति दिए जाने के हफ्तों बाद यह घटना घटी। शुरू में इसका विरोध हुआ, क्योंकि इस्लामाबाद में हिंदुओं की संख्या कम है। लेकिन सरकार ने कहा कि अगर वहां एक भी हिंदू है, तो उसे पूजा स्थल की जरूरत है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हमले तुरंत नहीं रुकेंगे, लेकिन कम से कम सरकार और जनता की तरफ से सख्त संदेश जरूर गया है कि ऐसी घटनाएं बर्दाश्त नहीं की जाएंगी। तीन सौ हमलावरों में से मौलाना फजलुर रहमान की पार्टी जेयूआई-एफ के दो मौलानाओं को गिरफ्तार किया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मंदिर आयोग का गठन किया है, जिसका पहला काम मुल्तान में प्रह्लादपुरी मंदिर का दौरा करना था, जो मंदिरों की स्थिति की समीक्षा और मूल्यांकन करने के शीर्ष आदेशों से संबंधित था। यह बहाउद्दीन जकारिया की मजार से सटा हुआ है। 


वर्ष 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस का बदला लेने के तौर पर इस पर हमला किया गया था।  शोएब सदल की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित आयोग ने, जिसमें साकिब गिलानी और नेशनल एसेंबली के रमेश कुमार सदस्य हैं, प्रहलाद मंदिर क्षेत्र, इसकी देखरेख और पुनर्वास योजना के बारे में जानकारी इकट्ठा कर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी है। नेशनल एसेंबली के सदस्य रमेश कुमार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आयोग का गठन अल्पसंख्यकों के लिए आशा की किरण था और संविधान ने पूरी तरह से अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा की है। 

सौजन्य - अमर उजाला।

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