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Monday, November 16, 2020

Editorial : धुआं हुई मनाही, जिद से जानलेवा हुआ प्रदूषण

दिल्ली समेत देश के कई शहरों में रविवार की सुबह जब लोग सैर को निकले तो उन्हें सांस लेने में खासी परेशानी का सामना करना पड़ा। देश की राजधानी व आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक यूं तो पांच सौ के आसपास था लेकिन कई जगहों पर आंकड़ा 999 की गंभीर श्रेणी तक जा पहुंचा। दिवाली पर अंधाधुंध आतिशबाजी ने हवा में जहर घोल दिया। सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी के फरमान पटाखों के साथ धुआं-धुआं हो गये। कमोबेश यही स्थिति गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम तथा पटना की भी रही। ऐसे में सांस के रोगों और कोविड संकट से जूझ रहे लोगों को सांस लेना भी मुश्किल हो गया। पटाखे छुड़ाने के लिए लगाया प्रतिबंध मजाक बनकर रह गया। दरअसल, प्रतिबंध के नियमों की धज्जियां उड़ाने के पीछे एक सोच यह भी काम कर रही थी कि हमारे त्योहारों पर प्रगतिशीलता का अंकुश क्यों? लोगों ने हालात की संवेदनशीलता और महामारी के घातक प्रभावों को नजरअंदाज ही किया। ऐसा नहीं है कि दिवाली से पहले दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हवा अच्छी ही थी, मगर इसके बाद खराब हवा खतरनाक स्तर तक जा पहुंची। हर इलाके के ए.क्यू.आई. बढ़ता चला गया जो कालांतर में बेहद खतरनाक स्थिति पर जा पहुंचा। वायु गुणवत्ता सूचकांक में वृद्धि हमारी चिंता का विषय होना चाहिए।


विकट स्थिति यह रही कि कई स्थानों पर लोगों ने धुंध के साथ आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी होने की बात कही है। सांस संबंधी रोगों के साथ यह समस्या कई गुना बढ़ जाती है। कह सकते हैं कि दमघोंटू हवा कोरोना संकट की भयावहता को और घातक बना सकती है। दिल्ली में रविवार को हुई बारिश व तेज हवाओं से प्रदूषण संकट से राहत मिलेगी। लेकिन समस्या का स्थायी समाधान तलाशने की जरूरत है। राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण का स्तर गंभीर स्थिति तक पहुंचना नागरिकों के स्वास्थ्य की दृष्टि से ही चुनौतीपूर्ण नहीं है बल्कि इससे देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। ऐसे में दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एनजीटी द्वारा तीस नवंबर तक पटाखे छोड़ने पर लगी रोक बेमानी साबित हुई। यह स्थिति तब है जब पीएम 2.5 और पीएम 10 का स्तर चिंताजनक स्थिति तक पहुंच चुका है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिल्ली के प्रदूषण में पराली की भी भूमिका है। वैसे शासन-प्रशासन पटाखों पर रोक लगाने में विफल रहा है। देर से लगी रोक के कारण पटाखा विक्रेताओं ने किसी तरह पटाखे बाजार तक पहुंचा ही दिये, जिसके चलते प्रदूषण बम वातावरण में फूट ही गया। ऐसे में दिवाली की रात हुई पटाखों की रोशनी आने वाले दिनों में सांस के रोगियों पर जहरीला आक्रमण करेगी। दिवाली के जश्न में मनाही के बाद भी लोग पटाखे जलाते रहे, इस बात से बेखबर कि वे किसी के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। यही वजह है कि पटाखों के धमाकों में तमाम कायदे-कानून धुआं-धुआं हो गये।

सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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