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Saturday, November 28, 2020

नए कृषि कानूनों का बेजा विरोध: धरना-प्रदर्शन और सड़कें जाम करने बड़ी संख्या में दिल्ली आ डटे किसान (दैनिक जागरण)

 Bhupendra Singh

धरना-प्रदर्शन और सड़कें जाम करना अपनी बात कहने का तरीका नहीं हो सकता। जब केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वह किसानों से बातचीत के लिए तैयार है तब उचित यही है कि अपनी आशंकाओं का समाधान वार्ता के जरिये ही किया जाए।


किसी को बरगलाने के कैसे नतीजे सामने आते हैं, इसका ताजा उदाहरण है दिल्ली में बड़ी संख्या में किसानों का आगमन। दिल्ली आ डटे ज्यादातर किसान पंजाब के हैं, जो वहां पहले से धरना-प्रदर्शन करने में लगे हुए थे। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि पंजाब के किसानों को उकसाकर पहले राज्य में आंदोलन के लिए उतारा गया और अब उन्हें दिल्ली भेज दिया गया है। समझना कठिन है कि हाल में संसद से पारित नए कृषि कानूनों से केवल पंजाब के किसानों को ही समस्या क्यों है? अगर नए कृषि कानून वास्तव में किसानों के लिए अहितकारी हैं तो फिर देश के अन्य हिस्सों के किसान पंजाब के किसानों की राह पर चलना पसंद क्यों नहीं कर रहे हैं? इस सवाल का एक जवाब यही है कि पंजाब के किसानों के आंदोलन के पीछे संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ हैं। किसानों को आगे कर राजनीतिक दल और आढ़तियों के संगठन अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में लगे हुए हैं।


हैरानी नहीं कि दिल्ली में कुछ वैसी ही स्थितियां देखने को मिलें जैसी नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ नजर आई थीं और शाहीन बाग इलाके में धरना देकर पूरे दिल्ली-एनसीआर की नाक में दम कर दिया गया था। नए कृषि कानूनों के विरोध में ऐसी स्थिति न बनने पाए, यह किसान संगठनों को भी सुनिश्चित करना होगा और साथ ही उन्हें समर्थन देने वाले किस्म-किस्म के संगठनों को भी और दिल्ली पुलिस को भी।


नए कृषि कानूनों के विरोध का औचित्य इसलिए नहीं बनता, क्योंकि अनाज खरीद की जो पुरानी व्यवस्था है उसमें कहीं कोई बदलाव नहीं किया गया है। नए कानूनों के जरिये एक वैकल्पिक व्यवस्था को आकार दिया गया है। यदि किसानों को पहले वाली व्यवस्था ठीक लगती है तो वे नए विकल्प के बजाय पुराने विकल्प को आजमाने के लिए स्वतंत्र हैं। बेहतर हो कि किसान संगठन यह देखें कि लगभग पूरे देश में किसानों को नए कानूनों से कहीं कोई समस्या नहीं है। उन्हें यह भी समझने की आवश्यकता है कि राजनीतिक दलों के बहकावे में आकर नए कृषि कानूनों का विरोध करके वे सबसे अधिक अपना ही अहित कर रहे हैं। उन्हें आढ़तियों के संगठनों के हाथों का खिलौना बनने के बजाय नई व्यवस्था के बारे में नीर-क्षीर ढंग से विचार करना चाहिए। वे यदि सुधार की राह पर चलने से इन्कार करेंगे तो अपने अतिरिक्त किसी अन्य को दोष नहीं दे सकते।

 

धरना-प्रदर्शन और सड़कें जाम करना अपनी बात कहने का तरीका नहीं हो सकता। जब केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वह किसानों से बातचीत के लिए तैयार है तब उचित यही है कि अपनी आशंकाओं का समाधान वार्ता के जरिये ही किया जाए।


सौजन्य - दैनिक जागरण। 

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