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कोविड-19 ने बदला शोध का तरीका?

प्रसेनजित दत्ता 



संकट बड़े बदलावों की शुरुआत की वजह बन सकते हैं। कोविड-19 महामारी के उपचार की तलाश ने भी औषधियों और टीकों को लेकर दुनिया भर में होने वाले शोध, चिकित्सकीय परीक्षण और औषधि उत्पादन के तरीके में नाटकीय बदलाव किया है। समय की कमी के चलते पुराने प्रतिद्वंद्वियों के बीच भी साझेदारी और गठजोड़ हुए हैं, सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच अप्रत्याशित स्तर का सहयोग देखने को मिला है और टीका बनने के पहले ही उसके उत्पादन के लिए क्षमताएं विकसित की जा चुकी हैं। इसके कारण औषधि शोध कंपनियों की प्राथमिकताओं में भी बदलाव आया है क्योंकि उन्होंने अन्य शोध परियोजनाओं को छोड़कर कोविड-19 के निदान को प्राथमिकता दी है। अपनी उत्पादन क्षमता की वजह से भारत भी इन सब बातों के केंद्र में है लेकिन चिकित्सकीय शोध और टीका बनाने में भी उसकी भूमिका कम अहमियत नहीं रखती।

सामान्य तौर पर किसी नए टीके या औषधि को बाजार में आने में 10 वर्ष या उससे अधिक समय लगता है। कोविड के मामले में शोधकर्ता, औषधि निर्माता कंपनियां तथा नियामक आदि इस समय को यथासंभव कम करने का प्रयास कर रही हैं। यह बात कई बड़े नवाचारों की वजह बन रही है। इसके चलते कुछ जल्दबाजी भी की गई है जो आज भले ही जरूरी हो लेकिन अगर लंबे समय तक कायम रखा गया तो यह खतरनाक साबित हो सकता है। जब हम वैश्विक औषधि उद्योग के महामारी का हल तलाशने के तरीकों पर नजर डालते हैं तो भी प्रश्न उठते हैं। इनमें से दो सवालों का संबंध मरीजों पर असर से है जबकि एक प्रश्न भारतीय औषधि उद्योग के भविष्य से ताल्लुक रखता है।


पहला सवाल यह है कि औषधि निर्माण को लेकर होने वाले शोध, चिकित्सकीय परीक्षण और उत्पादन को लेकर आज जो कुछ हो रहा है वह अस्थायी व्यवस्था है या यह जारी रहेगी? दूसरा, कोविड-19 के कारण फंड और शोधकर्ताओं के रूप में संसाधनों की संक्रामक बीमारी का निदान खोजने में अत्यधिक आवश्यकता पड़ी है। क्या इस बीमारी की दवा आ जाने या इससे बचाव का टीका बन जाने के बाद भी ये संसाधन इसी तरह आसानी से सुलभ रहेंगे? आखिर में तीसरा सवाल: क्या भारत भविष्य में भी इसमें अहम भूमिका निभाता रहेगा या वह केवल एक वैश्विक औषधि निर्माण केंद्र बनकर रह जाएगा?


कुछ बदलावों और उनके निहितार्थों पर नजर डालते हैं। कोविड-19 को लेकर जो वैश्विक प्रतिक्रिया हुई उसके फलस्वरूप बड़ी तादाद में साझेदारियां, गठजोड़ और वैश्विक समूहों का निर्माण देखने को मिला। ऐंटीबॉडी, टीका तथा अन्य तरह के शोध के लिए इनमें रोज इजाफा ही हो रहा है। भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया जैसी टीका निर्माता से लेकर सिप्ला और वॉकहार्ट जैसी औषधि कंपनियों तक सभी बड़ी-छोटी कंपनियों ने बीते कुछ महीनों में साझेदारियां की हैं या वे बड़े-छोटे समूहों का हिस्सा बनी हैं।


बुनियादी विचार यही है कि शोध के कुछ हिस्सों को बांटकर अलग-अलग जगहों पर समांतर ढंग से विकसित किया जाए ताकि समय की बचत हो सके। यही कारण है कि पारंपरिक दवा निर्माता, टीका शोधकर्ता, विश्वविद्यालयों के विभाग, जैव प्रौद्योगिकी फर्म, जेनोमिक उपक्रम और कृत्रिम मेधा क्षेत्र की स्टार्ट अप दूर होकर भी साथ मिलकर काम कर रहे हैं। शोध के आंकड़े जो कभी जबरदस्त निगरानी में रहते थे उन्हें अब सार्वजनिक मंच पर रखा गया है ताकि दुनिया भर के वैज्ञानिक उनका लाभ ले सकें।


एक और बड़ा बदलाव चिकित्सकीय शोध के तरीके में देखा जा रहा है। चूंकि पारंपरिक तरीके से अस्पताल में चिकित्सकीय परीक्षण किए जाने से प्रतिभागियों को वायरस से और प्रभावित होने का खतरा रहता है इसलिए आभासी चिकित्सकीय परीक्षणों पर जोर बढ़ा है। आभासी परीक्षण नए नहीं हैं लेकिन अब इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है। प्रतिभागियों तक दवा पहुंचाई जाती है और उनकी प्रगति और उन पर होने वाले असर पर दूर से डिजिटल तरीके से निगरानी रखी जाती है।


ये बदलाव अच्छे हैं लेकिन इसमें बुरी बात यह है कि आपात स्थिति के कारण दुनिया भर के नियामक अपेक्षाकृत कम अवधि के चिकित्सकीय परीक्षण के लिए मान गए हैं और सीमित आंकड़ों पर भरोसा कर रहे हैं और इसी के आधार पर आपात इस्तेमाल के लिए औषधियों को मंजूरी दी जा रही है जबकि उनका दीर्घकालिक चिकित्सकीय परीक्षण जारी रहेगा। यह उस समय देखने को मिला जब अमेरिका के संघीय औषधि प्रशासन ने रेमडेसिविर के आपात इस्तेमाल की इजाजत दे दी जबकि अभी इसके व्यापक प्रभाव का अध्ययन चल रहा है। सोचने वाली बात यही है कि औषधि नियामक ने फिलहाल जो रास्ता खोला है क्या वे उसे बंद कर सकते हैं।


इस बीच चूंकि दुनिया के विभिन्न देशों और अस्पतालों आदि में कोविड-19 के मरीजों की भरमार है इसलिए अनेक अन्य बीमारियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा पा रहा। इनमें डायबिटीज से लेकर कैंसर और टीबी से लेकर मलेरिया तथा डेंगू जैसी बीमारियां शामिल हैं। चूंकि बहुत बड़े पैमाने पर धन और संसाधन शोध कार्यों में लगाया जा रहा है इसलिए अन्य बीमारियों पर शोध को तवज्जो नहीं मिल पा रही। अतीत में कई पर्यवेक्षक कह चुके हैं कि संक्रामक बीमारियों से संबंधित शोध के साथ औषधि कंपनियां सौतेला व्यवहार करती रही हैं। बहरहाल अब बात एकदम उलट हो चुकी है।


कोविड-19 पर जितना ध्यान दिया जा रहा है और उसके लिए दवाएं और टीका बनाने में जो संसाधन लगाया जा रहा है वह करीब दो से चार साल तक जारी रहेगा। ऐसा इसलिए किसी को नहीं लगता कि शुरुआती टीके या दवाएं कोई चमत्कार करेंगी। ये बस फौरी उपाय होंगे। शोध तब तक जारी रहेगा जब तक कि बेहतर दवाएं और टीके नहीं बन जाते। लेकिन उसके बाद बेहतर यही होगा औषधि उद्योग और सरकारें बीमारियों पर शोध तथा ऐंटी वायरल और ऐंटीबायोटिक पर शोध में संतुलन कायम करें।


भविष्य में भारत की क्या भूमिका होगी? पश्चिमी देश व्यापक तौर पर भारत को उत्पादन केंद्र और चिकित्सकीय परीक्षण की बेहतर जगह तथा बड़ा बाजार मानते हैं। परंतु कोविड-19 शोध में भारतीय कंपनियां और सरकारी शोधकर्ता नई औषधियों और संभावित टीके पर काम कर रहे हैं। पारंपरिक तौर पर भारतीय कंपनियों की नई औषधि या टीका बनाने की कोई पहचान नहीं है। कोविड-19 एक अवसर हो सकता है इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने का।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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