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सही समय पर उपचार है निदान



डॉ राजीव मेहता, वरिष्ठ मनोचिकित्सक, सर गंगाराम अस्पताल

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो का वर्ष 2019 में आत्महत्या का आंकड़ा चिंतित करनेवाला है. प्रतिदिन 381 लोगों ने आत्महत्या की है. अवसाद और चिंता जैसे मानसिक विकारों से पीड़ित होने के कारण मनुष्य की उम्मीद खत्म हो जाती है. 90 प्रतिशत आत्महत्या के मामलों में यही कारण होता है. कुछ एक आवेगवश होती हैं. ऐसे मामलों में व्यक्ति को अवसाद या चिंता जैसी परेशानी तो नहीं होती लेकिन कुछ ऐसे कारण बन जाते हैं, जिससे वह आवेग में आकर तुरंत आत्महत्या करने का निर्णय कर लेता है.


यहां यह भी प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों लोग अवसाद और चिंता से घिर जाते हैं. इनसे ग्रस्त होने के अलग-अलग आयु वर्ग में अलग-अलग कारण होते हैं. किशोरवय से युवावस्था तक देखें, तो पढ़ाई में, संबंधों में असफल रहना, माता-पिता द्वारा बहुत ज्यादा डांट-फटकार लगा देना, या जिद पूरी नहीं होना इस आयु वर्ग में आत्महत्या के कारण बनते हैं. यहां पार्टनर से ब्रेकअप आत्महत्या की प्रमुख वजह बनती है. बात-बात में मां-बाप या स्कूल में शिक्षकों द्वारा नुक्ताचीनी करना, आत्महत्या करने का दूसरा कारण है. माता-पिता या शिक्षक अपनी जगह सही होते हैं, लेकिन उनकी जरूरत से ज्यादा टोका-टोकी से बच्चों के अंदर अवसाद उत्पन्न हो जाता है और वे अपनी जान ले लेते हैं.

पच्चीस वर्ष से अधिक आयु के जो व्यक्ति आत्महत्या करते हैं, उसका प्रमुख कारण, करियर में सफल न होना, पति-पत्नी के आपसी संबंधों में कड़वाहट आना या शादी का टूट जाना, प्रेमी/प्रेमिका से अनबन, विवाहेतर संबंधों का घर में पता लग जाना, घर से दूर रहने के कारण अकेलापन घेर लेना है. इसके अलावा, भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा चिंता, कोई ऐसी परेशानी आना, जिसे व्यक्ति झेल नहीं पाता और रोजमर्रा के दायित्वों को उठाने में असमर्थता से तनाव में आ जाता है. फिर ऐसी स्थिति में उसे अपना जीवन समाप्त करना ही बेहतर लगता है.


चालीस वर्ष की उम्र पार करने के बाद यदि आप कार्यस्थल पर अच्छा नहीं कर पा रहे हैं, तो नौकरी बचाये रखने की चिंता, जिम्मेदारियों का बहुत ज्यादा बढ़ जाना, घरेलू कलह, बच्चों का अपनी मर्जी का करना, अलग राह पर निकल जाना, उनमें शराब आदि बुरी लत का लगाना, उनका पढ़ाई में, करियर में पिछड़ते जाना व्यक्ति को तोड़ देता है. बच्चों की शादी यदि सही नहीं चल रही है तो भी माता-पिता काफी परेशान हो जाते हैं और परेशानियों का हल निकलता न देख अपनी जान ले लेते हैं.


साठ वर्ष का होने पर नौकरी खत्म हो जाती है, कइयों के पति/पत्नी की मृत्यु हो जाती है और अकेलापन घेर लेता है. बच्चों की माता-पिता के प्रति लापरवाही भी इस उम्र में काफी चोट पहुंचाती है. बीमारियों से घिर जाना और उनसे लड़ना भी इस उम्र में बहुत चुनौतीपूर्ण हो जाता है. संगी-साथी छूट जाते हैं. इन सब परेशानियों से लड़ते हुए व्यक्ति में अवसाद और चिंता के लक्षण उभरने लगते हैं, जिनका समय पर निदान न करना आत्महत्या का कारण बनता है.


अवसाद और चिंता के लक्षण होने पर व्यक्ति का मन उदास हो जाता है, वह परेशान व चिड़चिड़ा हो जाता है, किसी काम में उसका मन नहीं लगता है. उसकी नींद और भूख कम हो जाती है. वह किसी भी पल का आनंद नहीं उठा पाता है. उसकी एकाग्रता, धैर्य और याददाश्त कम हो जाती है, वह बातों को भूलने लगता है. व्यक्ति का आत्मविश्वास कम हो जाता है और वह बात-बात पर रोने लगता है. उसे अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगता है. जब किसी व्यक्ति को उसका भविष्य अंधकारमय लगने लगता है, तो उसके मन में सबकुछ त्यागने के विचार आने शुरू हो जाते हैं.


यह विचार एक-एक कर आते हैं. पहले व्यक्ति को लगता है कि वह सबकुछ छोड़ कर कहीं चला जाये. या फिर वह सोचता है कि भगवान उसे उठा ले. अवसाद के बहुत ज्यादा बढ़ जाने से खुद को खत्म करने का विचार मन में आता है. इसके बाद व्यक्ति मरने के तरीके सोचता है और खुदकुशी का प्रयास करता है. खुदकुशी के प्रयास में कई बार इंसान बच भी जाता है. यहां दो चीजें होती हैं. पहला, खुदकुशी का जो तरीका अपनाया गया है, उसके अंदर मारक शक्ति कितनी है, दूसरा, उस व्यक्ति के भीतर मरने की कितनी इच्छा है.


पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अवसाद दुगुना होता है, जबकि चिंता दोनों में बराबर ही होती है. लेकिन महिलाएं आत्महत्या के जो तरीके अपनाती हैं, अक्सर उसके अंदर मारक शक्ति कम होती है, इसलिए वो बच जाती हैं. जबकि पुरुष जो तरीके अपनाता है, उसकी मारक शक्ति बहुत अधिक होती है और वह मर जाता है.


आत्महत्या को रोकने के लिए, अवसाद को लेकर जो मिथ्याएं हैं, जैसे अवसाद को काउंसेलिंग से ठीक किया जा सकता है, यह अपने आप ठीक हो जाता है, सोच बदल कर इसे ठीक किया जा सकता है, उसे दूर करने की जरूरत है. जब दिमाग में किसी विशेष रसायन यानी न्यूरोट्रांसमीटर की कमी हो जाती है, तब इंसान की सोचने की शक्ति प्रभावित हो जाती है और उसके भीतर आत्महत्या के विचार आने लगते हैं. ऐसे में व्यक्ति को मनोचिकित्सक से दिखाने की जरूरत होती है, ताकि व्यक्ति का सही उपचार हो सके, उसे जरूरी रसायन मिल सके. जैसे ही व्यक्ति का उपचार पूरा होता है, उसके मस्तिष्क में उपस्थित रसायन की कमी दूर हो जाती है और वह पूर्णतः स्वस्थ हो जाता है.


(बातचीत पर आधारित)

सौजन्य - प्रभात खबर।

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