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पर्यावरण संरक्षण (बिजनेस स्टैंडर्ड)



औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) को लेकर सरकार की मसौदा अधिसूचना की जिस कदर आलोचना हुई है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इसमें सबकुछ ठीक नहीं है। मसौदे को सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए प्रस्तुत करने वाले पर्यावरण मंत्रालय को करीब 20 लाख आपत्तियां मिली हैं और अभी इनका सिलसिला जारी है। अंशधारकों का कहना है कि उन्हें अधिसूचना की बारीकियों का अध्ययन करने के लिए और अधिक समय चाहिए। ध्यान देने वाली बात यह है कि पर्यावरण कार्यकर्ता ही इस पर हमलावर नहीं हैं बल्कि कई छात्र, वैज्ञानिक, राजनेता, राज्य सरकारें और यहां तक कि स्थायित्व वाले पर्यावरण को लेकर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिवेदक ने भी इस अधिसूचना में खामियां पाई हैं।

एक सामान्य आपत्ति यह है कि विकास परियोजनाओं को मंजूरी देने वाले मानकों में प्रस्तावित बदलाव, पर्यावरण संरक्षण और मानव सुरक्षा के बजाय कारोबारी सुगमता को अधिक महत्त्व देता प्रतीत होते हैं। अनिवार्य सार्वजनिक मशविरे (ग्राम सभाओं की सहमति) की मौजूदा व्यवस्था को परियोजनाओं के एक बड़े हिस्से के लिए समाप्त किया जा रहा है। इतना ही नहीं कुछ प्रकार की गतिविधियों को या तो ईआईए की जवाबदेही से मुक्त करने का प्रस्ताव है या प्रथम दृष्टया भारी दुर्घटना की आशंका होने के बावजूद उनके लिए मामूली निगरानी की व्यवस्था प्रस्तावित है। रेड और ऑरेंज श्रेणी में वर्गीकृत 25 से अधिक उद्योगों को ए श्रेणी (इसके लिए विशेषज्ञों का कड़ा आकलन आवश्यक है) से हटाकर बी1 और बी2 श्रेणी में डाला जा सकता है। इन दोनों श्रेणियों में पर्यावरण प्रभाव आकलन के लिए सार्वजनिक मशविरे की बाध्यता समाप्त कर दी गई है। इसमें कई नुकसानदेह रसायन प्रसंस्करण और तेजाब बनाने वाले संयंत्र शामिल हैं। यह साफ तौर पर आंध्र प्रदेश में हाल में घटी एलजी पॉलिमर गैस रिसाव जैसी त्रासदियों को आमंत्रण है। उस घटना में 12 लोगों की जान गई थी और अनेक घायल हो गए थे। असम के बागजान में गैस से लगी आग भी ऐसी ही घटना थी जो दो सप्ताह तक भड़की रही और लोगों को बड़े पैमाने पर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाना पड़ा।


परियोजना तैयार होने के बाद मंजूरी देने संबंधी प्रावधानों पर भी विवाद है। यह प्रावधान ऐसी कई विवादित परियोजनाओं की राह खोल देगा जो बिना जरूरी मंजूरी के बन गई हैं। इसके अलावा इससे जानबूझकर देनदारी में चूक करने वालों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। केंद्र द्वारा बिना मानक वर्गीकरण के सामरिक घोषित की गई परियोजनाओं के लिए सार्वजनिक मशविरा या सूचना प्रसारित करने की जरूरत को खत्म करने का प्रस्ताव भी ऐसा ही है। इससे परियोजनाओं के वर्गीकरण में मनमानेपन की गुंजाइश बनेगी। आश्चर्य नहीं कि करीब 500 वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और विभिन्न आईआईटी के शिक्षकों एवं विद्वानों ने पर्यावरण मंत्री को खुला पत्र लिखकर इस मसौदे पर चेतावनी दी है। उन्होंने अधिसूचना वापस लेने की मांग की है और कहा है कि यह देश के पर्यावास और पर्यावरण की सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है।


ऐसे विरोध को देखते हुए बेहतर यही होगा कि पर्यावरण मंत्रालय खुले दिमाग से अधिसूचना की समीक्षा करे। इस दौरान आपत्तियों और अहम सुझावों पर भी ध्यान देना चाहिए। इसमें दो राय नहीं कि परियोजनाओं को मंजूरी की प्रक्रिया तेज करना जरूरी है लेकिन पर्यावरण संरक्षण और लोगों की सुरक्षा भी उतनी ही अहम है। विश्व पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक (2018) में भारत 180 देशों में 177 वें स्थान पर था। इससे अधिक गिरावट ठीक नहीं। ऐसे में वक्त आ गया है कि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के विरोधाभासी मुद्दों के बीच संतुलन साधा जाए। इस दौरान दोनों को तवज्जो देनी होगी। यह काम कठिन है लेकिन और कोई विकल्प भी नहीं है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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