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चौतरफा संकट : अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट मंदी का संकेत


ऐसे समय में जब पिछले कुछ दिनों में पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा देश में सामने आ रहा है, विकास दर का ऋणात्मक हो जाना गंभीर आर्थिक संकट का पर्याय है। वित्तीय वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के आंकड़ों मेें देश की विकास दर -23.9 गिर जाना स्तब्धकारी है। वर्ष 2019-20 में इस तिमाही में विकास दर 5.2 फीसदी रही थी। देश में मौजूदा पीढ़ी के लोगों ने शायद ही कभी इतनी बड़ी गिरावट देखी हो। मगर, विडंबना यह है कि इस बीच कोरोना संक्रमण की दूसरी वेव हमारे अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयासों को बड़ी चोट दे रही है। कहा जा रहा था कि जुलाई में अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है, लेकिन कोरोना के कहर के बीच फिलहाल तुरंत समाधान की कोई गुंजाइश नजर भी नहीं आती। निस्संदेह यह स्थिति मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है। कहा जा रहा है कि कोरोना संकट के चलते अचानक घोषित सख्त लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को बुरी तरह झकझोरा है। भारत जैसे देश में जहां जीडीपी में सर्विस सेक्टर का योगदान साठ फीसदी है, वहां करोड़ों लोगों ने रोजगार खोये हैं। अकेले टूरिज्म इंडस्ट्री में तीन से चार करोड़ नौकरियां गई हैं। जानकारों का मानना है कि सामाजिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए तो लॉकडाउन की जरूरत थी लेकिन देश की आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह से बंद नहीं किया जाना चाहिए था। जीडीपी का ऋणात्मक हो जाने का आंकड़ा ऐसे समय पर आया है जब देश में अनलॉक चार की प्रक्रिया शुरू हो रही है और कुछ क्षेत्रों को फिर से खोला जा रहा है। हालांकि, लॉकडाउन के परिणामों से केंद्र सरकार पहले से ही वाकिफ थी। यही वजह है कि राज्यों से लॉकडाउन लगाने का अधिकार वापस ले लिया गया था और केवल कंटेनमेंट जोन में ही लॉकडाउन लगाने की इजाजत दी गई ताकि आर्थिक गतिविधियों में और व्यवधान न आने पाये।


अधिकांश रेटिंग एजेंसियां व आर्थिक विशेषज्ञ देश की जीडीपी में गिरावट का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन इतनी बड़ी गिरावट का अंदेशा नहीं था। निस्संदेह जीडीपी के आंकड़े मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका है और विपक्ष को धारदार हमले का मौका देते हैं। जीडीपी के आंकड़े आने से पहले ही कांग्रेस की तरफ से वीडियो जारी करके मोदी सरकार पर बड़ा हमला बोला गया था। उधर, जीडीपी आंकड़े आने से पहले सोमवार को शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। शायद बाजार को अनुमान था कि अर्थव्यवस्था में बड़ी गिरावट दर्ज होने वाली है। दरअसल, जीएसटी के कलेक्शन में आई भारी गिरावट पहले ही संकेत दे रही थी कि जीडीपी के आंकड़ों में बड़ी गिरावट आ सकती है, लेकिन इतनी बड़ी गिरावट का आकलन नहीं था। कभी देश में दो अंकों में विकास दर पहुंचने की बात कही जाती थी, अब यह ऋणात्मक रूप से दो अंकों तक जा पहुंची है, जिसके भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए दूरगामी नकारात्मक परिणाम होंगे, जिससे उबरने में देश को लंबा वक्त लग सकता है। वह भी ऐसे दौर में जब कोरोना संकट और गहरा होता जा रहा है। हालांकि, सरकार को भी इस बात का अहसास था कि देश की जीडीपी में बड़ी गिरावट दर्ज हो सकती है। उसने कुछ कदम इस दिशा में उठाये भी, मगर स्थितियां इतनी विकट हो चुकी थीं कि धरातल पर उनका प्रभाव नजर नहीं आया। निस्संदेह इस बड़े संकट से उबरने के लिये केंद्र सरकार को युद्ध स्तर पर प्रयास करने की जरूरत है। यह अच्छी बात है कि इस दौरान कृषि क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे यह विश्वास बना है कि देश को खाद्यान्न संकट से नहीं जूझना पड़ेगा। बहरहाल, जीडीपी के पहले तिमाही के निराशाजनक आंकड़े आर्थिक मंदी का भी संकेत है, जिससे आम आदमी के जीवन पर खासा प्रतिकूल असर पड़ सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि तीसरी तिमाही तक जीडीपी में धनात्मक वृद्धि देखने को मिलेगी।


सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।

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