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न्यूनतम सरकार, शासकीय सेवकों के कामकाज की समीक्षा को लेकर नए दिशानिर्देश जारी


मोदी सरकार ने शासकीय सेवकों के कामकाज की समीक्षा को लेकर नए दिशानिर्देश जारी करने के साथ ही अफसरशाही को और अधिक सक्षम तथा सुसंगत बनाने की कोशिश तेज कर दी है। इसके मुताबिक उन कर्मचारियों के कामकाज की समीक्षा की जाएगी जो 50 से 55 आयु वर्ग के हों या 30 वर्ष की सेवा अवधि पूरी कर चुके हों। ऐसे जो अधिकारी भ्रष्ट या अक्षम पाए जाएंगे उन्हें सेवानिवृत्ति लेनी होगी। ये नियम केंद्रीय सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम 1972 के फंडामेंटल रूल 56(जे) में पहले से मौजूद थे। जून 2019 में 27 वरिष्ठ कर अधिकारियों को भ्रष्टाचार के कारण इसी नियम के तहत जबरन सेवानिवृत्त किया गया था। इसके अलावा राजस्व सेवा के 22 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त किया गया था और केंद्रीय सचिवालय सेवा के 284 अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के लिए छांटा गया था। यह पहला मौका था जब इस नियम का इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया। अपने ताजा परिपत्र में सरकार इस प्रक्रिया को नियमित कर रही है। इसके लिए लक्षित समूह के अफसरशाहों का एक रजिस्टर तैयार किया जा रहा है और उनकी त्रैमासिक समीक्षा की जा रही है।


नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद यह अफसरशाही को तीसरा संगठनात्मक झटका है। सबसे पहले 2016 में शासकीय सेवकों के लिए सालाना गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) के अलावा कॉर्पोरेट शैली में मूल्यांकन की व्यवस्था की गई थी। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि एसीआर को प्राय: निष्प्रभावी माना जाता था। दूसरे कदम में सन 2018 और 2019 के दौरान अफसरशाही में संयुक्त सचिव, निदेशक और उपसचिव स्तर के पदों को सेवा से बाहर निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों के लिए खोल दिया गया। अब 'मिशन कर्मयोगी' पहल के तहत अफसरशाही को और अधिक रचनात्मक, सक्रिय, पेशेवर और तकनीक संपन्न बनाने के लिए एक परिषद का गठन किया जा रहा है जिसमें मंत्रीगण, मुख्यमंत्री  और मानव संसाधन विशेषज्ञ शामिल हैं तथा जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री के पास है। इसके अलावा 'क्षमता निर्माण आयोग' के गठन की बात भी कही गई है। एक साथ देखें तो इन घटनाओं ने अफसरशाही के मजबूत ढांचे को झटका दिया है लेकिन छह वर्ष में 20 लाख से अधिक कर्मचरियों में से करीब 300 पर कार्रवाई करने से यही पता चलता है कि इस दिशा में बहुत सक्रियता नहीं दिखाई गई। अफसरशाही को आराम की नौकरी माना जाता है और इसके लिए अधिक मजबूत आकलन प्रक्रिया अपनाने की जरूरत लंबित थी लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम मोदी के न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन  या सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेंगे?


नीति में उम्र वाला हिस्सा शायद ठीक नहीं। तीन दशक के अनुभव वाले अफसरशाह अनमोल अनुभव और जानकारी से लैस होते हैं। भ्रष्ट और अक्षम लोगों को जरूर निकाला जाना चाहिए लेकिन यह स्पष्ट नहीं है यह नीति युवा अधिकारियों पर क्यों नहीं लागू होनी चाहिए। भारत जैसे देश में अफसरशाही और कार्यपालिका का रिश्ता उलझाऊ है ऐसे में किफायत के मानक अलग-अलग हो सकते हैं। ईमानदार अधिकारियों के दंडात्मक तबादले और अफसरशाही के कामकाज में राजनीतिक बाधाओं से हम सभी वाकिफ हैं। तीसरा, एक पुरानी समस्या यह भी है कि अफसरशाहों को अतीत में लिए गए निर्णयों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है। यह अफसरशाहों के पूरी क्षमता से काम करने की राह में बड़ा रोड़ा है। कांग्रेस सरकार के दौर में कोयला ब्लॉक आवंटन के मामले में और सन 2000 के दशक के आरंभ में पहली भाजपानीत सरकार के कार्यकाल में निजीकरण के दौरान ऐसा देखने को मिला। इस इतिहास को देखते हुए यह अहम है कि उम्रदराज और काम न करने वाले अधिकारियों को हटाना राजनीतिक बदले की कवायद न बन जाए। 'मिशन कर्मयोगी' में इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।


सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।

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