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हर जरूरतमंद के घर पहुंचे अनाज


यामिनी अय्यर, अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी, सेंटर फॉर पॉलिसी  


काश! अभी जो कुछ हो रहा है, वह सच न होता। मार्च के अंत में, जब देश में लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी, तब सरकार को लालफीताशाही से बचने, अपना तौर-तरीका बदलने, केंद्र-राज्य के आपसी संबंध को सुधारने और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को चुस्त-दुरुस्त बनाने की तत्काल जरूरत मैंने बताई थी। लॉकडाउन से पैदा होने वाले आर्थिक संकट से मुकाबले के लिए यह सब किया जाना जरूरी था। हमें भरोसा था कि केंद्र सरकार अपना खजाना खोलते हुए राहत-उपायों के लिए कहीं अधिक उदार साबित होगी। मगर बीते पांच महीनों में 80,000 करोड़ टन मुफ्त अनाज में से महज एक चौथाई प्रवासी मजदूरों में बंट पाए हैं। इससे पता चलता है कि देश ने न तो राजकोषीय उदारता दिखाई और न ही अपना तौर-तरीका बदला। अब आर्थिक संकट भी गहरा रहा है। ऐसे में, पांच महीने पहले कही गई उन बातों को फिर से समझने की दरकार है। 

सबसे पहले, सार्वजनिक जन-वितरण प्रणाली (पीडीएस) को सभी के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। लॉकडाउन से पहले केंद्र ने इस दु:साध्य योजना का विस्तार किया था, और अब इसे नवंबर तक बढ़ा दिया गया है। पर सरकार इसे सार्वभौमिक नहीं बना सकी, यानी जिनके पास राशन कार्ड नहीं है, उन्हें अनाज उपलब्ध कराने की वह कोई ठोस व्यवस्था नहीं कर सकी।

मई में, जब प्रवासी मजदूरों के विराट संकट से बचना असंभव हो गया, तब पीडीएस की पात्रता आठ करोड़ प्रवासी मजदूरों तक बढ़ा दी गई, जिनमें से अधिकतर के पास राशन कार्ड नहीं थे। उस सिस्टम के लिए, जो कागजी कार्रवाई और ‘पहचान मांगने’ की समस्या में उलझा हो, पात्रता के इस विस्तार को जमीन पर उतारना आसान नहीं था। इसकी बजाय, उसने प्रवासियों की पहचान और अस्थाई राशन कार्ड जारी करने से संबंधित अपनी नीतियां बनाईं। यह बताने के लिए कि तमाम मुश्किलों के बावजूद सराहनीय काम किए गए हैं, कुछ राज्य सरकारों ने इसका हल निकालने की कोशिश करते हुए स्थानीय सर्वेक्षणों के माध्यम से, ऑनलाइन पोर्टल से अस्थाई राशन कार्ड जारी किए। मगर ये सभी प्रक्रियाएं बोझिल और समय जाया करने वाली होती हैं। ये सरकारी कामकाज में दु:साध्य कागजी कार्रवाइयों का एक नया दरवाजा खोल देती हैं। यही वजह है कि तय किए गए आठ करोड़ मजदूरों में से महज 18 फीसदी को इस योजना का लाभ मिल पाया है।

ऐसा सिर्फ प्रवासी श्रमिकों के साथ नहीं हुआ। जाने-माने अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा और ज्यां द्रेज के अनुमानों के मुताबिक, सामान्य समय में भी करीब 10 करोड़ भारतीय पीडीएस के हकदार होने के बावजूद इसका लाभ नहीं उठा पाते। दूसरे शब्दों में, उनके पास राशन कार्ड नहीं है, जिस वजह से उन्हें अनाज नहीं मिल पाता। सर्वे बताते हैं कि लॉकडाउन के बाद से बिना राशन कार्ड वाले बहुत कम लोग पीडीएस से अनाज पा सके हैं।

संभावित लाभार्थियों का नाम लिखने या अस्थाई राशन कार्ड जारी करने की बजाय जरूरी यह है कि पीडीएस का अनाज सभी जरूरतमंदों को मिले। पीडीएस केंद्र पर भ्रष्टाचार और एक बार से अधिक अनाज ले जाने वालों को रोकने के लिए कई उपाय किए जा सकते हैं, मगर सबसे पहले राज्यों को कागजी कार्रवाई या पहचान-पत्र मांगने जैसे तौर-तरीके छोड़ने होंगे। वक्त का तकाजा है कि संकट को पहचानकर मांग-आधारित पीडीएस व्यवस्था बनाई जाए। ‘एक देश-एक राशन कार्ड’ पर काम करने की बजाय सार्वजनिक जन-वितरण प्रणाली को तत्काल सर्वसुलभ बना देने की दिशा में सरकार को तत्परता दिखानी चाहिए। ऐसा कम से कम तब तक जरूर किया जाना चाहिए, जब तक कि हम मौजूदा आर्थिक संकट से बाहर नहीं निकल जाते।

दूसरा, राज्यों को धन मुहैया कराने के प्रति लचीला रुख अपनाया जाना चाहिए। कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में राज्य सबसे आगे खडे़ हैं, लेकिन वे एक अलग तरीके से महामारी व इसके आर्थिक परिणामों का सामना कर रहे हैं। अपनी आर्थिक मुश्किलों को देखते हुए अधिकांश राज्यों ने राजस्व में कमी की भरपाई के लिए केंद्र से कोविड-19 राहत अनुदान देने की मांग की है। लेकिन केंद्र ने सीमित संसाधनों के साथ एक केंद्रीकृत राहत पैकेज का रास्ता चुना, जिसमें बहुत लचीलापन नहीं दिखाया जा सकता। उदाहरण के लिए, यदि राज्य नकद हस्तांतरण के साथ मनरेगा के कार्यस्थल को बदलने की सोचते हैं, तो वे ऐसा नहीं कर सकते। इससे राज्यों को आर्थिक संकट से निपटने के लिए अभिनव तरीके न अपनाने का बना-बनाया बहाना भी मिल गया है। अभी देश में एक गतिशील, विकेंद्रित, संस्थागत संरचना विकसित करने की जरूरत है, जो चुनौतियों के खिलाफ कारगर हो। राज्यों को कोविड-19 राहत अनुदान देने के लिए हमें एक चुस्त राजकोषीय हस्तांतरण फॉर्मूला अपनाना होगा, जो साझा बीमा प्रणाली की तरह हो। इसके लिए राज्यों में समन्वित प्रयास की भी दरकार होगी। ऐसा करने के लिए अंतर-राज्यीय परिषद जैसा संस्थागत तंत्र हमारे पास है। इसे तत्काल पुनर्जीवित करना चाहिए। और आखिरी में, भारत सरकार आय में मदद करने संबंधी प्रावधानों में अधिक खर्च करने से नहीं बच सकती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संभावित लचीलापन मनरेगा से ही जुड़ा हुआ है।

चूंकि ज्यादातर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग अपनी आधी क्षमता में काम कर रहे हैं और बुआई का मौसम भी जल्द खत्म होने वाला है, इसलिए मनरेगा की मांग और बढ़ जाएगी। मगर इसका पैसा तेजी से खत्म भी हो रहा है। राज्यों ने इसके लिए आवंटित सालाना धनराशि का एक तिहाई पहले ही खर्च कर दिया है। ऐसे में, मनरेगा में फंड मुहैया कराया जाना और इसके काम का विस्तार निहायत जरूरी है। इस बात के पर्याप्त सुबूत हैं कि कोविड-19 से पैदा हुए आर्थिक संकट के मूल में मांग की कमी है। लिहाजा, अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए राज्यों को अपना खजाना खोलना होगा। लेकिन इसके लिए जरूरी यह भी है कि वे अपना तौर-तरीका बदलें। देखा जाए, तो आज सबसे बड़ी बाधा यही है कि देश संकट से प्रभावी ढंग से लड़ने और उदार प्रतिक्रिया में अड़ियल रवैया अपना रहा है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

सौजन्य -  हिन्दुस्तान।

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