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राहत को आर्थिक तुष्टीकरण बनाना अनुचित : Dainik Tribune Editorial

गुरबचन जगत
तीस जून को सरकार ने हमारे गरीब भाई-बहनों को कोविड-19 महामारी के दृष्टिगत और कुछ महीने राशन सामग्री जारी रखने की घोषणा की है। जाहिर है यह मात्रा बहुत बड़ी है। उक्त निर्णय भली नीयत के साथ जनता को राहत देने वाला है। विश्वास है कि केंद्र सरकार की इस घोषणा के बाद गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी इसका अनुसरण करेंगे। पिछले कई सालों में कोई भी मौका बनने पर मुफ्त राहत सामग्री देने का चलन पैदा हो गया है, फिर चाहे अवसर प्राकृतिक आपदा का हो या चुनाव का, यहां तक कि किसी विशेष समस्या के बिना भी घोषणा कर दी जाती है। नतीजतन अब जब कभी भी कुछ घटित होता है तो लोगों की ओर से पैसे, अन्न-दाल इत्यादि के लिए मांग होनी शुरू हो जाती है। देखना यह है कि इसमें जरूरतमंदों के हाथ में वास्तव में कितना पहुंचता है? आपदा के समय राहत देना एकदम न्यायोचित है लेकिन इसे आर्थिक तुष्टीकरण की नीति बनाना सही नहीं है।
राहत किस किस्म की हो और कब, इस पर विचार होना चाहिए। आपात स्थिति बनने पर जहां हमारी सरकारों का ध्यान आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को न्यूनतम जरूरत का दाल-चावल देने पर लगा होता है वहीं पश्चिमी जगत में सरकारें बेरोजगारों और प्रभावित हुए व्यवसायियों के हाथ में गुजारे लायक पैसा बना रहे, इस पर अपना ध्यान केंद्रित करती हैं। कोविड-19 महामारी के कारण किए गए निष्ठुर लॉकडाउन ने हमारी आर्थिकी को करारा झटका दिया है और मंतव्य संभालने में नाकामयाबी से अर्थव्यवस्था को दुबारा पटरी पर लाने के लिए बहुत ज्यादा प्रयास करने पड़ेंगे। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली मात्र 1 प्रतिशत की कमी से ही असंख्य परिवार गरीबी की गर्त में और नीचे धंस जाएंगे। मौजूदा चोट पहले से कमजोर पड़ी अर्थव्यवस्था के समय में पड़ी है। 

बृहद सवाल पर आएं तो जब कोई आपदा न हो तब खैरात बांटना क्यों जरूरी होता है? यह कृत्य हमारी नीतियों में बड़े बदलाव का हिस्सा बन गया है और राजनेताओं को जब कभी जनता को पुचकारना हो या चुनावों में वोट बटोरने हों तो मुफ्त चीजों की घोषणा कर देते हैं। देश के आर्थिक परिदृश्य में सार्थक सुधार करने की बजाय नेताओं के लिए यह पत्ता खेलना ज्यादा आसान होता है। पिछले 72 सालों के दौरान हम ऐसा कारगर कृषि-औद्योगिक ढांचा बनाने में विफल रहे हैं जो देशवासियों के लिए रोजगार और विकास सुनिश्चित कर सके। मुद्दा चाहे राष्ट्रीय सुरक्षा का हो या विकास एवं रोजगार का, हम एक राष्ट्रीय नीति बनाने में असफल रहे हैं। हम अपनी बजट प्रक्रिया को जरूरत से ज्यादा महत्व देते हैं जबकि बजट का काम केवल विभागों को धन का प्रावधान करना है। विगत में हमने पंचवर्षीय योजनाएं बनाई हैं, मिश्रित अर्थव्यवस्था का प्रयोग किया है। इस दौरान विपक्षी दल निजी क्षेत्र को और ज्यादा भूमिका देने की मांग करते रहे जबकि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई का ‘द बॉम्बे क्लब’ यानी कुछ बहुत बड़े सरमाएदारों का समूह देश के मुख्य क्षेत्रों पर बने अपने एकाधिकार से खुश था।
वर्ष 2014 में नई सरकार के गठन के साथ लगा था कि आखिर देश में निजीकरण के दिन आ गए हैं। हालांकि इसे लागू करने वालों को अंदाजा नहीं था कि यहां भी मायूसी मिलने वाली है, क्योंकि आरंभिक शोरगुल के बाद समाजोन्मुखी आर्थिक नीतियां फिर से अपनानी पड़ीं और धरातल पर विशेष बदलाव नहीं हुए सिवाय इसके कि ‘बॉम्बे क्लब’ की जगह धीमे से एक अन्य कुलीन गुट को स्थापित कर दिया गया, जिसने सरकार की मदद से देश के टेलीकॉम, सौर ऊर्जा, तेल, बिजली, दृश्य एवं प्रिंट मीडिया इत्यादि क्षेत्रों में लगभग एकाधिकार बना लिया है। तो आज हम जहां हैं वहां पाते हैं कि एक ओर समाजवाद की बात करने वाले और कुलीन गुट है, जिसके साथ एक मजबूत केंद्रीकृत सरकार है तो दूसरी ओर वह जनता है जो आम स्थितियों में भी आर्थिक मदद और वस्तु रूपी खैरात की आस रखती है। चुनावों से पहले तो इसमें अतिरिक्त दरकार जुड़ जाती है।

हम इस खैरात संस्कृति को कैसे बदल सकते हैं? इसके लिए नए संस्थागत उपाय किए जाएं और मौजूदा व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए। प्रगति के लिए सबसे मूलभूत जरूरत है अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण एवं शहरी विकास तंत्र और एक ऐसी न्याय व्यवस्था जो यथेष्ठ समय में फैसले दे सके। आज याचिकाकर्ता को अदालती फैसले के लिए अंतहीन इंतजार करना पड़ता है, लिहाजा हमारा न्यायिक ढांचा ऐसा बनकर रह गया है, जिसमें अंतर्निहित अक्षमता की पैठ हो चुकी है, इस तरह तो हमारी अर्थव्यवस्था आधुनिक बनने से रही। समयबद्ध कानूनी फैसले होने चाहिए, न कि मुकदमे एक अदालत से दूसरी में फुदकते फिरें, तभी कहते हैं ‘देर से मिला न्याय… अन्याय’ है।
आज देश के ग्रामीण अंचल में प्रभावी शिक्षा तंत्र लगभग कहने भर का है, खासकर उत्तर और मध्य भारत में, गोकि शिक्षा के मामले में दक्षिण भारत के विद्यालयों और कॉलेजों की स्थिति बेहतर है। अगर अमेरिका की सिलिकॉन वैली, अंतरिक्ष क्षेत्र और आईवी लीग यूनिवर्सिटियों में कार्यरत भारतीयों की संख्या को देखें, तो पाते हैं कि उनमें बहुत बड़ी संख्या में विशेषज्ञ दक्षिण भारत से आते हैं और उनमें लगभग सभी विदेशों में बसे हुए हैं। यही स्थिति कॉलेज और विश्वविद्यालयों में भी देखने को मिलती है जहां दक्षिण भारतीय आगे हैं। अनुसंधान एवं विकास पर हमारे उद्योग और विश्वविद्यालय ज्यादा समय और धन नहीं लगाते। समाज में कारगर स्वास्थ्य तंत्र एक बहुत बड़ी जरूरत है और हालिया घटनाक्रम ने सिद्ध कर दिया है कि मानव संसाधनों और ढांचागत सुविधाओं की कितनी बड़ी कमी है। वहन योग्य स्वास्थ्य देखभाल सभी नागरिकों को उपलब्ध होनी चाहिए, खासकर उनको जो समाज के निचले तबके में हैं।
गरीबी के निचले पायदान के लोगों का कहना है कि यदि अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर हों तो हमारे बच्चे भी इस गुरबत से निकल सकते हैं। इसीलिए निजी सुख तजकर वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। जिनकी माली हालत अच्छी है, वे अपने बच्चों को विदेशों में पढ़ने भेज देते हैं। अगर हम शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्या से सही ढंग से निपट पाएं तो हम अपनी बहुत बड़ी अलामत यानी अनियंत्रित ढंग से बढ़ती आबादी पर लगाम लगा सकते हैं। लेकिन आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक दल इस पर सख्ती से काम करने को राजी नहीं है। हालांकि अगर पढ़े-लिखे वर्ग पर नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि ज्यादातर परिवारों में एक या दो ही बच्चे हैं। इससे बच्चे को अच्छी शिक्षा और व्यावसायिक दर्जा पाने में खुद-ब-खुद आसानी हो जाती है। अगर हम इस समस्या पर आज से काम करना शुरू करें तब भी नतीजे आने में दो दशक लग जाएंगे।
औद्योगिक क्षेत्र को फिर से सरकारी उपक्रम बनाने की बजाय मैदान को निजी क्षेत्र के लिए खुला छोड़ देना चाहिए और नए उद्यमियों को मदद देने के अलावा एकाधिकार बनाने पर रोक लगानी होगी। युवा भारतीय उद्यमियों को आगे आने का मौका देना होगा और उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए ताकि वे अपना भविष्य विदेशों की बजाय देश में बनाना पसंद करें। स्थापित उद्योग-धंधा लंबे समय तक चलता है और इसमें विस्तार भी होता है। लेकिन इस क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाई जाए।
कृषि से आय को इतना आकर्षक बनाया जाए ताकि युवा खेती तजने की बजाय करना पसंद करें। फसल चक्र को क्षेत्रीय जरूरतों और मंडी के हिसाब से बनाया जाए। नई कृषि नीति को लेकर किसानों में बहुत-सी आशंकाएं पैदा हो गई हैं और उन्हें डर है कि सरकारी एजेंसियां खरीद करने मंडी में नहीं आएंगी और कृषक व्यापारियों के रहमोकरम पर छूट जाएगा। मूल्य निर्धारण का मुद्दा ऐसा है जो किसान के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण है।
बिना जायज कारण मुफ्त की खैरात देने की प्रथा बंद होनी चाहिए। मदद केवल आपदा के समय दी जाए, दान में मिली सहायता संस्थागत व्यवस्थाओं के जरिए मिलने वाले संबल, जैसे कि उद्योग, कृषि विकास, तकनीक, शिक्षा और स्वास्थ्य का विकल्प नहीं हो सकती। जरूरी हुआ तो वृद्धि एवं विकास पर राष्ट्रीय नीति बनाने हेतु संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए। वैसे भी संसद की संस्थागत विधि को दरकिनार किया जा रहा है। अब संसद में बाकायदा बहस के बाद कानून बनाकर लागू करने की बजाय अध्यादेशों से काम चलाया जा रहा है।

लेखक यूपीएससी के अध्यक्ष एवं मणिपुर के राज्यपाल रहे हैं।
सौजन्य - दैनिक ट्रिब्यून।
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