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संपादकीय : राजकोषीय मोर्चे पर सजगता बरतने के शुरुआती संकेत - Business Standard Editorial

ए के भट्टाचार्य 
चालू वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में केंद्र सरकार की राजस्व एवं व्यय स्थिति के बारे में जारी अस्थायी आंकड़े वर्ष 2020-21 के बाकी महीनों में सरकारी वित्त के समक्ष आने वाली तनावपूर्ण चुनौतियों को काफी स्पष्टता से पेश करते हैं। ये चुनौतियां राजकोषीय घाटे में खासी बढ़ोतरी की वजह से और बढ़ेंगी। बजट में राजकोषीय घाटे के सकल घरेलू उत्पाद का 3.5 फीसदी रहने का लक्ष्य रखा गया था।

लेकिन राजकोषीय चुनौती की प्रकृति को इन अस्थायी आंकड़ों में बीजरूप में मौजूद सूचनाओं के अध्ययन से कहीं बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इन आंकड़ों से उधारी में वृद्धि के वास्तविक स्तर, बढ़ते घाटे की भरपाई के लिए अब तक किए गए सरकारी प्रयासों और प्रतिकूल प्रभाव का सामना कर रहे राजस्व क्षेत्र एवं लगभग ठप हो चुके सरकारी व्यय के विशिष्ट क्षेत्रों के बारे में अधिक जानकारी मिलती है। इन घटनाओं से संबंधित पांच प्रवृत्तियां गौर करने लायक हैं।

पहली, अप्रैल-मई 2020 में सरकार का राजकोषीय घाटा या इसकी कुल उधारी करीब 4.66 लाख करोड़ रुपये रही जो इस साल के बजट लक्ष्य 7.69 करोड़ रुपये का करीब 59 फीसदी है। अगर वित्त वर्ष 2019-20 के पहले दो महीनों की उधारी से तुलना करें तो इस साल सरकारी उधारी में 27 फीसदी की तेजी दर्ज की गई है।

इस फिसलन को एक और तरह से देखा जा सकता है। सरकार ने पहले से ही अपने उधारी के बजट लक्ष्य को 7.96 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 12 लाख करोड़ रुपये करने की घोषणा कर रखी है। इस हिसाब से पहले दो महीनों में उधारी बढ़े हुए उधारी स्तर का महज 39 फीसदी ही है। यह पुराने बजट लक्ष्य के 59 फीसदी आंकड़े से तो बेहतर ही है। तमाम व्यावहारिक कारणों से अब बजट में जताए गए अनुमान पर टिके रहना अप्रासंगिक हो चुका है।

वर्ष 2019-20 के पहले दो महीनों में सरकार की कुल उधारी या राजकोषीय घाटा बजट में घोषित अनुमान का 52 फीसदी था। लेकिन पिछले साल के 9.35 लाख करोड़ रुपये के वास्तविक घाटा आंकड़ों से तुलना करें तो इन दो महीनों में घाटा 48 फीसदी ही रहा था। अधिक उधारी जुटाने के फैसले को देखते हुए इस साल के उधारी आंकड़ों में अधिक विचलन नहीं दिखता है। आने वाले महीनों में इसकी वजह से थोड़ी राहत मिल सकती है।

दूसरी, वर्ष 2020-21 के पहले दो महीनों में घाटे की भरपाई के स्रोतों पर फौरी नजर डालें तो बाह्य वित्त संसाधनों पर सरकार की निर्भरता में तीव्र वृद्धि दिखाई देती है। वर्ष 2019-20 की समूची अवधि में बाह्य वित्त 11,600 करोड़ रुपये ही था। लेकिन इस साल के पहले दो महीनों में ही सरकार 29,000 करोड़ रुपये की उधारी बाहर से जुटा चुकी है। बाह्य उधारी में यह वृद्धि राष्ट्रीय लघु बचत कोष से लिए गए 53,000 करोड़ रुपये की उधारी से इतर है जिसका पहले बजट में जिक्र भी नहीं था।

तीसरी, अप्रैल-मई 2020 के दौरान सरकार की प्राप्तियों पर कर एवं गैर-कर दोनों ही तरह के राजस्वों में कमी के कारण असर पड़ा है। इस दौरान सकल कर राजस्व 1.26 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो पिछले साल की समान अवधि में जुटाए गए कर से 41 फीसदी कम है। इन महीनों में कोविड-19 का प्रसार होने और उस पर काबू पाने के लिए देश भर में लगाए गए लॉकडाउन का कर राजस्व पर प्रतिकूल असर देखा गया है।

अप्रैल-मई अवधि में गैर-कर राजस्व में तो 62 फीसदी की और भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। पिछले साल इसी अवधि में 28,423 करोड़ रुपये गैर-कर राजस्व जुटाया गया था लेकिन इस बार यह सिर्फ 10,817 करोड़ रुपये रहा है। इसी तरह गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियां (विनिवेश से होने वाली आय भी शामिल) 73 फीसदी की जबरदस्त गिरावट के साथ 831 करोड़ रुपये रही हैं। विनिवेश पर 2.1 लाख करोड़ रुपये का राजस्व निर्भर होने से गैर-ऋण पूंजी प्राप्ति में इतनी बड़ी गिरावट आना निश्चित रूप से चिंता का सबब है।

चौथी, वित्त वर्ष के पहले दो महीनों में सरकार का कुल व्यय 5.12 करोड़ रुपये रहा है जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 0.22 फीसदी की मामूली गिरावट दिखाता है। हालांकि इस दौरान सरकार का पूंजीगत व्यय 16 फीसदी बढ़कर 55,206 करोड़ रुपये हो गया। इसका राजस्व व्यय 1.85 फीसदी की गिरावट के साथ 4.57 लाख करोड़ रुपये रहा। लेकिन राजस्व व्यय के मदों पर गौर करें तो महामारी से निपटने के लिए सरकार के नजरिये में बदलाव भी दिखेगा।

मसलन, सरकार का कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्याण विभागों पर व्यय अप्रैल-मई 2020 में 89 फीसदी की जोरदार उछाल के साथ 30,580 करोड़ रुपये रहा है। ग्रामीण विकास (मनरेगा के तहत रोजगार देने के लिए) पर व्यय 131 फीसदी की जबरदस्त बढ़त के साथ 59,612 करोड़ रुपये रहा। इस दौरान पशुधन, डेयरी एवं मत्स्यपालन पर व्यय 446 फीसदी वृद्धि (295 करोड़ रुपये), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण में 39 फीसदी वृद्धि (16,878 करोड़ रुपये) और श्रम विभाग पर व्यय 345 फीसदी बढ़कर 1,501 करोड़ रुपये रहा।

सड़क एवं राजमार्ग पर व्यय में भी खासी तेजी देखी गई है। पिछले साल की समान अवधि में महज 328 करोड़ रुपये रहा व्यय इस बार 12,636 करोड़ रुपये हो गया है। इन विभागीय खर्चों में वृद्धि का यह मतलब है कि महामारी के दौरान स्वास्थ्य एवं कल्याण योजनाओं से किसी तरह नहीं जुड़े विभागों के व्यय में भारी कटौती हुई है।

अंत में, खाद्य, उर्वरक एवं पेट्रोलियम उत्पादों पर दी जाने वाली भारी सब्सिडी पर सरकार का व्यय 41 फीसदी गिरकर 67,469 करोड़ रुपये पर आ गया। इसकी बड़ी वजह यह है कि कच्चे तेल के दामों में गिरावट का रुख रहा लेकिन यह बढ़त अस्थायी हो सकती है।

भविष्य में सरकार के राजकोषीय प्रबंधन की राह चुनौतियों से भरपूर रह सकती है। पहले दो महीनों के रुझान यही बताते हैं कि सरकार को सजग रहने की जरूरत है।

सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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