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अधर में शांति समझौते का भविष्य : Amar Ujala Editorial


 कुलदीप तलवार  

दुनिया में अधिकांश देश जहां अपने नागरिकों की जान बचाने के लिए कोरोना महामारी को रोकने में लगे हुए हैं, वैक्सीन की तलाश की जा रही है, वहीं अफगानिस्तान में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है।

अमेरिका और तालिबान के बीच अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए  29 फरवरी को जो शांति समझौता हुआ था, उस पर पूरा अमल नहीं हो पा रहा है। हिंसा की वजह है अफगान सरकार के किसी प्रतिनिधि का इस समझौते की बातचीत में शामिल नहीं होना।
इस समझौते के तहत दो हजार तालिबान लड़ाकों को जेलों से छोड़ना अब भी बाकी है, वहीं तालिबान की कैद में रहने वाले एक हजार अफगान सुरक्षाकर्मियों को नहीं छोड़ा गया है। उम्मीद कि जा रही थी कि समझौते के बाद हिंसा में कमी आएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
तालिबान ने एक ही सप्ताह में 222 हमले किए, जिसमें 400 से ज्यादा  अफगान सुरक्षाकर्मियों को अपनी जान गंवानी पड़ी और डेढ़ सौ से ज्यादा लोग घायल हुए। अफगान सरकार पर दबाव बनाने के लिए कई धार्मिक गुरुओं को भी निशाना बनाया गया।

समझौते के बाद झूठा प्रचार किया गया कि अमेरिका तालिबान के बीच हुए समझौते में पाकिस्तान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसकी पोल अमेरिका के विदेश विभाग की आतंकवाद पर ताजा रिपोर्ट ने अब खोली है।

इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान ने अफगान शांति प्रक्रिया में कोई सकारात्मक योगदान नहीं किया। रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान हक्कानी नेटवर्क को अपनी जमीन उपयोग करने की इजाजत देता है, जो अफगानिस्तान व भारत को निशाना बनाते हैं।

इसे संयोग ही कहा जाएगा कि यह रिपोर्ट ऐसे समय में सामने आई है, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने नेशनल एसंेबली में अपने भाषण के दौरान अमेरिका में 9/11 को हुए आतंकी हमले के मास्टर माइंड आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को शहीद करार दिया। इससे पाकिस्तान का दशहतगर्द समर्थक चेहरा उजागर हुआ है।

पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी देखना नहीं चाहता है। उसने हक्कानी नेटवर्क का सहारा लेकर अफगानिस्तान में भारतीय ठिकानों पर हमले भी करवाए। अफगानिस्तान के राजनीतिक विश्लेषक खालिद सादात का कहना है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में एक छद्म भूमिका अदा कर रहा है।

तालिबान की बातों पर किसी भी सूरत में यकीन नहीं किया जा सकता। चंद दिन पहले ही तालिबान ने कश्मीर मुद्दे को भारत का अंदरूनी मामला बताते हुए इस पर पाक का साथ न देने की बात कही थी। जबकि इससे ठीक पहले कहा था कि काबुल में कब्जे के बाद कश्मीर को भी छीन लिया जाएगा।

इधर अफगानिस्तान में शांति प्रक्रिया में जुटे वार्ताकारों से जुड़े समाचार भी सामने आ रहे हैं। इनके मुताबिक, शीर्ष तालिबान नेताओं के कोरोना महामारी से संक्रमित हो जाने के बाद पैदा हुए मतभेदों के कारण तालिबान नेतृत्व में खलबली मची हुई है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट की मानें, तो संयुक्त राष्ट्र के सदस्य अलकायदा व तालिबान के रिश्तों से परेशान हैं। यह खुलासा भी हुआ है कि तालिबान में एक नया गुट कलायत-हैज-ई बना है, जो शांति समझौते के खिलाफ है।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और अब्दुल्ला अब्दुल्ला के बीच मतभेदों को भुलाकर हाल ही में जो सत्ता समझौता हुआ है, शायद ही पुख्ता साबित हो। कुछ दिन पहले दो अफगान राष्ट्रपतियों के शपथ ग्रहण के समय अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने कहा कि यदि वे दोनों मिलजुलकर काम नहीं करेंगे, तो इस साल के साथ अगले साल के लिए भी एक अरब डॉलर की अमेरिकी मदद काट दी जाएगी।

अमेरिका में आगामी नवंबर माह में राष्ट्रपति चुनाव है। अधिकांश मतदाताओं ने नस्लवाद, कोरोना और बेरोजगारी को अमेरिका के लिए बड़ा खतरा बताया है। और ट्रंप को इन तीनों मोर्चों पर विफल करार दिया है।

इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने के बाद ही अमेरिका तालिबान शांति समझौते के भविष्य का पता चलेगा। मौजूदा हालात से पता चलता है कि शांति समझौता अधर में है और यह शायद ही टिकाऊ साबित होगा।

सौजन्य - अमर उजाला।
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