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हाशिये पर रहे हिंदूवादी दबाव समूहों का मुख्यधारा पर बढ़ता प्रभाव


आदिति फडणीस

क्या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का एक धड़ा ऐसा भी है जो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में 2019 की अंतिम रात्रि और 2020 की भोर में घटे घटनाक्रम को लेकर भ्रमित है। वह धड़ा है पार्टी की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप)। वाम रुझान वाले छात्रों को घसीटे जाने से जुड़ी गहरी आत्मतुष्टि (कई तो सोच रहे होंगे कि उन्हें ऐसा करने को क्यों नहीं मिला) और कथित रूप से वाम द्वारा शुरू की गई तोडफ़ोड़ को लेकर दंभपूर्ण रोष के बीच बंटी अभाविप को कम से कम जेएनयू में खुद से यह सवाल पूछना होगा कि क्या वक्त आ गया है कि अब वह हिंदू रक्षा दल जैसे 'असली' हिंदुओं के लिए जगह बनाए? यह वही दल है जिसने जेएनयू में हुए हमले की जिम्मेदारी ली है।


सवाल यह है कि केवल जेएनयू ही क्यों? 'असली' हिंदू तो अब हर जगह हैं। गौरी लंकेश को मारने वाले गैंग से लेकर हिंदू युवा वाहिनी, श्री राम सेना तक तमाम ऐसे हिंदू समूह हैं जो देश भर में देखे जा सकते हैं। इनमें विभाजन दिख रहा है लेकिन ये समाप्त नहीं हो रहे। भाजपा विरोधी कार्यकर्ता और संपादक गौरी लंकेश की हत्या कर दी गई थी। हत्या की जांच कर रहे विशेष जांच बल ने पाया कि उनकी हत्या भाड़े के हत्यारे परशुराम वाघमारे ने अमोल काले नामक व्यक्ति के कहने पर की थी। कम से कम 12 लोगों का नाम उस षडयंत्र में शामिल है जिसके तहत न केवल लंकेश की हत्या की गई बल्कि वाम विचारक गोविंद पानसरे और तर्कवादी और अंधविश्वास को दूर करने के लिए काम कर रहे नरेंद्र दाभोलकर की भी हत्या की थी। 9,000 पन्नों से अधिक के आरोप पत्र में कहा गया है कि ये सभी सह-षडयंत्रकारी कभी न कभी हिंदू जनजागृति समिति, सनातन संस्था और श्री राम सेना से जुड़े रहे थे। हिंदू जनजागृति समिति ने कहा है कि उसकी स्थापना मौजूदा 'धर्मनिरपेक्ष' लोकतंत्र, समाज की स्थिति को देखते हुए हुई जहां धर्म और राष्ट्र दोनों का पराभव हो रहा है। उसके मुताबिक धर्म आधारित शासन की आवश्यकता है और उसके लिए हिंदू राष्ट्र का गठन करना होगा, यह वक्त की मांग है और इसके जरिये ही हिंदुओं की समस्याओं को हल किया जा सकता है।

श्रीराम सेना की स्थापना प्रमोद मुतालिक ने की। यह वही संगठन है जिसने पबों में हमले कर महिलाओं को घसीटा था। अब मुतालिक को आरोप मुक्त कर दिया गया है। इसके बावजूद मुतालिक के कई भाजपा शासित राज्यों तक में प्रवेश करने पर रोक है। इनमें गोवा भी शामिल है। कुछ वर्ष पहले जब पेजावर स्वामी विश्वेश तीर्थ (जिनका गत माह निधन हो गया) ने उडुपी में कृष्ण मंदिर परिसर में इफ्तार का आयोजन किया था तो सेना ने उन्हें शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी।

हिंदू युवा वाहिनी की स्थापना योगी आदित्यनाथ ने सन 2002 में राम नवमी के दिन उत्तर प्रदेश में की थी। शुरुआत में इसकी परिकल्पना युवाओं के एक संगठन की थी जिसमें हिंदू शब्द गोरखपुर के संत अवेद्यनाथ की सलाह पर जोड़ा गया था जो उस वक्त जीवित थे। हिंदू युवा वाहिनी के सह संस्थापक रहे सुनील सिंह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते योगी आदित्यनाथ को अपने एक समर्थक को विधानसभा का टिकट दिलाने के लिए गिड़गिड़ाना पड़ा था। इसके बाद ही दबाव समूह के रूप में युवा वाहिनी का गठन किया गया और पूर्वी उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ का कद बढ़ा।

जब आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए तो उन्होंने सत्ता में भागीदारी की हिंदू युवा वाहिनी की मांग को अनसुना करना शुरू कर दिया। सुनील सिंह ने अलग होकर अपनी अलग हिंदू युवा वाहिनी भारत गठित कर ली। उन्हें तत्काल राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत बंदी बना लिया गया। वह कई माह बाद जेल से छूटे। प्रतिक्रिया स्वरूप आदित्यनाथ ने हिंदू युवा वाहिनी (उप्र) का गठन किया। अब पूर्वी उत्तर प्रदेश में कम से कम दो समूह हैं जो एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में योगी सेना नामक एक अन्य संगठन इसी उद्देश्य से सक्रिय है। एक ओर जहां हिंदू युवा वाहिनी का कहना है कि वह मुख्यमंत्री को शर्मिंदा करने वाला कोई काम नहीं करेगी और वह स्वयं को बाढ़ राहत आदि बांटने जैसे निर्विवाद कामों तक सीमित बताती है वहीं असल में संगठन क्या करता है इसकी जानकारी किसी को नहीं। हिंदू युवा वाहिनी यह स्वीकार करती है कि उसके समर्थक उबाऊ गतिविधियों में जोड़े रखने से नाराज हैं और उन पर लगाम लगाए रखना आसान नहीं।

भारत की तरह अमेरिका में भी बीते कुछ वर्षों के दौरान ऐसे हाशिये वाले समूहों की गतिविधियों में इजाफा देखने को मिला है। ऐंटी-फासिस्ट संगठन 'एंटीफा' नियमित रूप से धुर दक्षिणपंथी रैलियों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करता है। इस समूह का प्रमुख लक्ष्य है किसी भी कीमत पर फासीवादी ताकतों का मुकाबला करना और अमेरिका के मताधिकार वंचित समूहों के अधिकारों की हर कीमत पर रक्षा करना। 'प्राउड बॉयज' समूह स्वयं को पश्चिम समर्थक भातृ सुलभ संगठन कहता है। समूह की सदस्यता लेने के लिए यह आवश्यक है कि संभावित सदस्य उद्देश्य रक्षा के लिए बड़ी लड़ाई में शामिल होने को तैयार रहें।

भारत में यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि यह सब कहां समाप्त होगा। यहां ऐसे संगठन संगठित हैं। इसका विरोध नेतृत्वविहीन और अभिव्यक्त करने में असमर्थ है लेकिन वह लडऩे और वापसी करने के लिए प्रतिबद्घ है। दिक्कत यह है कि अभाविप हमला करने की दृष्टि से तीव्र लेकिन घायल होने से आशंकित माना जा रहा है। एक जंग है जो आज नहीं तो कल शुरू होगी और उसे किसी को तो जीतना होगा। यह लड़ाई मत पेटियों के जरिये नहीं जीती जा सकती। 
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