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कैसे कम हो रेलवे पर सामाजिक बोझ

विनायक चटर्जी 

रेलवे लाभकारी संगठन है या गैर-लाभकारी? इसका सही उत्तर है दोनों। रेलवे की कई सेवाएं ऐसी हैं जो मुनाफे के लिए चलाई जाती हैं। साथ ही कुछ गतिविधियां ऐसी हैं जिनमें मुनाफा कमाना लक्ष्य नहीं होता हैं। पीयूष गोयल सहित सभी रेल मंत्रियों का यही तर्क रहा है कि इस विशेष परिस्थिति के कारण रेलवे के वित्तीय प्रदर्शन में समस्या होती है। उनकी इस दलील में वाकई दम है। इस महीने की शुरुआत में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने रेलवे के वित्तीय प्रदर्शन पर अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा है कि रेलवे का परिचालन अनुपात (ओआर) 2017-18 में 98.44 फीसदी था। ओआर को किसी भी संगठन की कार्यकुशलता का अहम कारक माना जाता है। सरल भाषा में कहें तो रेलवे ने 100 रुपये की कमाई पर 98.44 रुपये खर्च किए। यह दस साल का उच्चतम स्तर है। सीएसजी ने साथ ही दलील दी कि अगर रेलवे को दो सार्वजनिक उपक्रमों से नकद अग्रिम राशि नहीं मिलती तो वह घाटे की स्थिति में पहुंच जाती। उसे 100 रुपये की कमाई पर 102.6 रुपये खर्च करने पड़ते।

रेल मंत्री ने संसद में इस रिपोर्ट पर उत्तर देते हुए कहा कि दो कारणों से रेलवे का वित्तीय प्रदर्शन गड़बड़ाया। पहली वजह यह थी कि सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने से रेलवे पर 22,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा। दूसरी वजह यह थी कि रेलवे ने पूर्वोत्तर, सीमावर्ती और पहाड़ी इलाकों में रेल संपर्क बढ़ाने के लिए अच्छा खासा निवेश किया है। इन फैसलों में लागत वसूली लक्ष्य नहीं था। लाभकारी बनाम गैर-लाभकारी परिचालन और सेवाओं की गुत्थी को सुलझाना आसान नहीं है।

पूरी रेल व्यवस्था में सब्सिडी दी जाती है और यह उसके परिचालन में गहराई से मिली हुई है। इनमें लागत से कम यात्री किराये की कीमत, घाटे वाले मार्गों पर परिचालन, उपनगरीय सेवाओं पर नुकसान, विशेष श्रेणियों के लिए किराये में छूट, लागत से कम किराये पर आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई शामिल है। इन सामाजिक सेवाओं से 2017-18 में भारतीय रेलवे पर करीब 32,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ा। 2016-17 के दौरान केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू किए जाने से कर्मचारियों पर खर्च 17.2 फीसदी और पेंशन 31.8 फीसदी बढ़ गया। खासकर पेंशन पर बढ़ते खर्च पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है। रेलवे के पेंशनरों की संख्या 13 लाख है जबकि कर्मचारियों की संख्या 12 लाख। 2008-09 में रेलवे का पेंशन खर्च उसके कुल परिचालन राजस्व का 14 फीसदी था जो 2017-18 में बढ़कर 28 फीसदी हो गया।

आशंका है कि अगले 10 वर्ष में पेंशन बोझ परिचालन राजस्व के 40 फीसदी से ऊपर जा सकता है। रेलवे बोर्ड ने अपने परिचालन राजस्व को बेहतर बनाने के लिए वित्त मंत्रालय को इस पेंशन बोझ में योगदान देने का अनुरोध किया है।  एक सीमा के इतर यात्री किराया बढ़ाना राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामला है। इससे मुनाफे का बोझ माल ढुलाई पर पड़ता है जिससे यात्री परिचालन में सब्सिडी मिलती है। 2016-17 में रेलवे को यात्री सेवाओं पर करीब 38,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था जिसकी भरपाई मालढुलाई परिचालन से हुए 40,000 करोड़ रुपये के मुनाफे से हुई। लेकिन मालढुलाई परिचालन में भी रेलवे को कुछ आवश्यक वस्तुओं पर किराये की दर लागत से कम रखनी पड़ती है।

विवेक देवराय और किशोर देसाई द्वारा तैयार किए गए नीति आयोग के एक दस्तावेज में रेलवे के राजस्व पर सामाजिक सेवा दायित्वों के असर का गहराई से अध्ययन किया गया है। इसके मुताबिक वित्त वर्ष 2014-15 में रेलवे को करीब 33,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ जो उस वर्ष उसके कुल यात्री राजस्व का 67 फीसदी था। इनमें से 77-80 फीसदी नुकसान गैर उपनगरीय सेवाओं में यात्रियों की विभिन्न श्रेणियों के किराये के कारण हुआ था। इस नुकसान में उपनगरीय ट्रेन सेवाओं (मुंबई में स्थानीय रेल सेवाएं) का हिस्सा 12-13 फीसदी है। यहां तक कि एसी1 भी नुकसान में है। इसका किराया हवाई किराये के बराबर माना जाता है।

इस रिपोर्ट के लेखकों ने खुद कहा है कि मुनाफा आकलन के इस दृष्टिकोण में खामियां हैं। इसके मुताबिक कारोबार में लागत और राजस्व में फर्क के लिए परिचालन अक्षमताओं जैसे कारणों के बजाय सामाजिक सेवा दायित्व जिम्मेदार हैं। इस तरह के दृष्टिकोण से तार्किक निष्कर्ष यह होगा कि रेलवे को अपना नुकसान पाटने के लिए हर यात्री श्रेणी में लागत के बराबर किराया बढ़ाना पड़ेगा। राजनीतिक संवेदनशीलता को शामिल किए बिना भी ऐसा करना व्यावहारिक नहीं है।

तो फिर इसका हल क्या है?

निश्चित रूप से यह चर्चा अहम है कि किस हद तक रेलवे को विशुद्ध रूप से मुनाफे की शर्त पर परखा जाना चाहिए क्योंकि उसके पास सामाजिक सेवा का दायित्व भी है। हालांकि यह भी सच है कि अक्षमताओं के कारण भी रेलवे की लागत में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। रेलवे को अपनी अक्षमताओं को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए और इसमें सामाजिक सेवा दायित्व आड़े नहीं आना चाहिए। उसे नुकसान को काबू में करने के लिए अपनी तरफ से हरसंभव प्रयास करना चाहिए। हालांकि परिचालन अनुपात को दो श्रेणियों व्यावसायिक परिचालन अनुपात और सामाजिक दायित्व अनुपात में बांटने का समय आ गया है। इसके लिए रेलवे की वित्तीय स्थिति का गहराई से अध्ययन जरूरी है। साथ ही देश के लोगों को भी यह जानना जरूरी है कि भारतीय रेलवे को सामाजिक दायित्वों की लागत वहन करनी पड़ रही है।

(लेखक फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं) 
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