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करों से इतर

टी. एन. नाइनन

बजट के समय यह बात चकित करती है कि कर दरों और राजस्व को लेकर कितनी अधिक चर्चा होती है। हालांकि आम बजट में इनकी हिस्सेदारी 60 फीसदी है। मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी वर्ष में यह 52 फीसदी थी। घाटे की भरपाई के लिए ली गई उधारी समेत कुल गैर कर राजस्व शेष 40 फीसदी हिस्से के लिए उत्तरदायी है। परंतु गैर कर राजस्व बढ़ाने या व्यय में बचत के जरिये उधारी कम करने पर उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यह चकित करने वाला है क्योंकि कर राजस्व के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में तेज गति से बढऩे के बावजूद गैर कर राजस्व कम रह गया। यदि कर राजस्व बेहतर रहा तो उसकी वजह 2014-16 के बीच तेल कीमतों में  कमी से मिला लाभ बड़ी वजह था। अरुण जेटली ने तेल कीमतों में कमी से उपजे इस अवसर का लाभ कर राजस्व में कमी की पूर्ति करने में किया। हालांकि इसका कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं को भी लौटाया गया। व्यक्तिगत कराधान और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के मामले में भी काफी कुछ करने की आवश्यकता है। इन विषयों पर शोरगुल तो बहुत हो रहा है लेकिन गैर कर राजस्व पर पर्याप्त तवज्जो नहीं दी जा रही है। विनिवेश प्राप्तियों और दूरसंचार जैसे क्षेत्रों में राजस्व के कुप्रबंधन से परिस्थितियां खराब हैं। राजस्व के लिए व्यग्र सरकार ने अपनी कंपनियों का सहारा लिया और उनसे लाभांश भुगतान बढ़ाने या उसके लिए कर्ज लेने को कह दिया। इस वर्ष तो वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिजर्व बैंक तक से अधिशेष राशि हासिल कर ली।

इस कहानी का दूसरा सिरा यह बताता है कि यह धन जाता कहां है। सरकारी बैंकों की बैलेंस शीट सुधारने में खरबों रुपये लगे। जबकि इतनी बड़ी तादाद में राशि राजमार्ग और रेलवे में निवेश की गई लेकिन इससे वह प्रतिफल हासिल नहीं हुआ जो होना चाहिए था। रखरखाव और परिचालन अनुबंधों के जरिये राजमार्गों से और अधिक धन जुटाया जा सकता था क्योंकि इनसे सरकार को शुद्घ राजस्व मिलता है। रेलवे उच्च गति, उच्च क्षमता वाले माल वाहन कॉरिडोर बनाने के अंतिम चरण में है लेकिन अभी तक यह सुनिश्चित नहीं है कि इन लाइनों पर किस तरह का यातायात आएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि मौजूदा उपलब्ध रेल यातायात में भी कंटेनरों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है और इन कॉरिडोर के आसपास नए विकास केंद्र न संचालित हैं, न उनका विकास हो रहा है। इस बीच इस वर्ष करीब 20,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि का इस्तेमाल डाक विभाग को संचालित रखने के लिए किया जा रहा है। ऐसा मोटे तौर पर इसलिए हो रहा है क्योंकि वेतन और पेंशन बिल राजस्व से कहीं अधिक है।

एयर इंडिया और भारत संचार निगम लिमिटेड जैसी हजारों करोड़ रुपये की नुकसान वाली कंपनियां भी कमोबेश इसी वजह से चल रही हैं। डाक विभाग के नेटवर्क को बैंक में बदलने की बात भी केवल बात ही रह गई है। यदि सरकार संबंधित कंपनियों और मंत्रालयों से प्रदर्शन की अपेक्षा करती तो बजट का गैर कर वाला हिस्सा जोर पकड़ता और गैर निष्पादित परिसंपत्तियों वाली कंपनियों के समर्थन में ज्यादा बजट आवंटन नहीं होता। विडंबना यह है कि सरकार इन कंपनियों के साथ ऐसा व्यवहार करती है मानो उसके पास इन्हें देने के लिए पर्याप्त पैसा है। जबकि सच यह है कि सरकार खुद नकदी के संकट से दो चार है। क्या खाद्य भंडार के प्रबंधन को अधिक किफायती बनाया जा सकता है? क्या बिजली उत्पादकों के भुगतान में कमी की पूर्ति केंद्रीय करों में राज्यों के दावे से पूर्ववर्ती तौर पर किया जा सकता है। यदि निजी पोत कारखाने तय समयसीमा और लागत में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं तो क्या उन्हें कारोबार दिया जाना चाहिए, क्योंकि वर्तमान में शासकीय पोत कारखाने भी ऐसा नहीं कर पा रहे? क्या मूल्य निर्धारण से जुड़े निर्णयों से राजनीति को अलग किया जा सकता है ताकि सब्सिडी के बोझ में कमी की जा सके?

संक्षेप में, सरकारी धन के व्यवस्थित इस्तेमाल के कई तरीके हैं। यदि सरकार को इसे लेकर प्रतिबद्घता दिखानी है तो क्या यह वह इसे लेकर वैसी ही प्रतिबद्घता दिखा सकती है जैसी उसने नागरिकता संशोधन कानून के मसले पर दिखाई? अहम प्रश्न यह है कि सरकार आर्थिक सुधार पर कितनी राजनीतिक पूंजी व्यय करने को तैयार है? क्या वह ऐसे निर्णय ले सकती है जो आबादी के एक धड़े को नापसंद हों? यदि एयर इंडिया नहीं बिकती तो क्या उसे बंद किया जाएगा? आखिर, निजी विमानन कंपनियां भी बंद हुई हैं तो एयर इंडिया क्यों नहीं? ऐसे निर्णय लेने के लिए अर्थव्यवस्था को पहली प्राथमिकता पर लाना होगा। फिलहाल ऐसा नहीं लगता। 
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