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सीएए क्यों अतार्किक और अनैतिक है

रामचंद्र गुहा

मोदी सरकार ने आखिर बिना सोचे-विचारे नागरिकता संशोधन अधिनियम में इतनी राजनीतिक पूंजी क्यों लगा दी है। यह अधिनियम साफ तौर पर अतार्किक है, कम से कम इसलिए क्योंकि इसने भारत की जमीन में रह रहे राज्यविहीन शरणार्थियों के सबसे बड़े समूह को अपने दायरे से अलग रखा है, और ये हैं श्रीलंका के तमिल जिनमें से वास्तव में अनेक लोग हिंदू हैं। यह अधिनियम साफ तौर पर अनैतिक भी है, क्योंकि इससे एक धर्म इस्लाम को अलग रखा गया है, ताकि उसके साथ विद्वेषपूर्ण व्यवहार किया जा सके। यदि सीएए से जुड़े तर्क और नैतिकता संदिग्ध हैं, तो इसे लाए जाने का समय कम रहस्यपूर्ण नहीं है। क्या अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करना और भारत के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य को सिर्फ एक केंद्र शासित प्रदेश में बदल कर भाजपा के कट्टर हिंदुत्व समर्थक आधार को ही संतुष्ट नहीं किया गया? क्या अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने एक विशाल नए राम मंदिर के निर्माण को मंजूरी नहीं दी, जिसने उन्हें और संतुष्ट किया? क्या आधार बढ़ाने का उनका लालच इतना बढ़ गया है कि इन दो कदमों के बाद इतनी जल्दी तीसरा कदम उठाना पड़ गया?

जम्मू और कश्मीर को कमतर करना और अयोध्या में मंदिर का निर्माण ये दोनों मुद्दे भाजपा के लिए सांकेतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं। लिहाजा कोई आसानी से समझ सकता है कि लोकसभा में लगातार दूसरी बार मिले बहुमत ने मोदी सरकार को इन मुद्दों पर तुरंत आगे बढ़ने की ताकत दी। लेकिन सीएए तो मामूली महत्व का मुद्दा है, अनुमान व्यक्त किया गया था कि इसके पारित होने से कुछ हजार शरणार्थी ही भारतीय नागरिकता हासिल करेंगे। तो फिर इसे इतना महत्व क्यों दिया गया? खासतौर से ऐसे समय जब अर्थव्यवस्था बेहद बुरी स्थिति में है और इस पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है?

मोदी सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम को संसद में पारित कराने के लिए दिखाई गई अनुचित हड़बड़ी के पीछे संभवतः दो कारण हो सकते हैं। पहला है, कट्टरता, जिसके पीछे है गणतंत्र के मुस्लिम नागरिकों को और पीछे धकेलने की वैचारिक मजबूरी ताकि वे यहां हिंदू बहुसंख्यकों की अनुकंपा या दया पर निर्भर होकर रहें। दूसरा कारण है अक्खड़पन, यह समझ (या भ्रांति) कि चूंकि भारत के मुस्लिमों ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने या अयोध्या के संबंध में अदालत के फैसले पर किसी तरह का विरोध नहीं जताया, इस बार भी वे उनकी अपनी सरकार द्वारा उन पर लादे जा रहे प्रचंड उत्पीड़न को चुपचाप स्वीकार कर लेंगे।

मगर इसका उलटा हो गया। भारतीय मुस्लिम इस खतरनाक कानून के विरोध में बड़ी संख्या में बाहर आ गए। ऐसा, पूर्व में किए गए प्रयास और प्रधानमंत्री के गले न उतरने लायक इनकार करने के बावजूद, इसलिए हुआ, क्योंकि भारत सरकार और खासतौर से गृह मंत्री ने बार बार स्पष्ट किया है कि नागरिकता संशोधन कानून राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के साथ ही लागू किया जाएगा। इसने यह भय पैदा (जो कि पूरी तरह से वैध है) किया कि इस जुड़वा ऑपरेशन के जरिये विशेष रूप से मुस्लिमों को निशाना बनाया जाएगा, एनआरसी में छूट गए गैर मुस्लिम तुरंत सीएए के आधार पर नागरिकता के लिए पुनः आवेदन कर सकते हैं।

सीएए और एनआरसी के खिलाफ हो रहे लोकप्रिय प्रदर्शनों का एक खास पहलू यह है कि इसमें सारे धर्मों के लोग उत्साह के साथ शामिल हो रहे हैं। कोलकाता और बंगलूरू, मुंबई और दिल्ली में दसियों हजार गैर मुस्लिम भारतीयों ने माना है कि यह नया कानून वास्तव में हमारे गणतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों को धक्का पहुंचाने वाला है। यही बात छात्रों के बारे में कही जा सकती है, जिनकी मौजूदगी और उनका नेतृत्व उल्लेखनीय होने के साथ ही महत्वपूर्ण है।

प्रदर्शनों का दूसरा अनूठा पहलू है इन्हें मिल रहा अंतरराष्ट्रीय कवरेज। ऐसा दो वजहों से हुआ, बड़े पैमाने पर भागीदारी और राज्य की बर्बर प्रतिक्रिया। मई, 2014 के बाद से मोदी सरकार की किसी कार्रवाई ने इस स्तर के विरोध का दूर से भी सामना नहीं किया था। न तो नोटबंदी ने और न ही अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने के कदम ने। हफ्तों से हजारों लोग मौजूदा सत्ता के खिलाफ अपना गुस्सा और असंतोष जाहिर करने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। दिल्ली जैसे शहरों में सरकार ने घबराहट में कदम उठाए और धारा 144 लागू कर दी, इंटरनेट बंद कर दिया और मेट्रो लाइनें बंद कर दीं। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सरकार ने निर्मम ताकत का इस्तेमाल किया।

इस मुद्दे को व्यापक रूप से अंतरराष्ट्रीय कवरेज मिला है और यह समान रूप से नकारात्मक है। इस अधिनियम को हर जगह, जैसा कि यह है भी, भेदभाव करने वाले कानून के तौर पर देखा जा रहा है। कई दशकों तक भारत को दक्षिण एशिया के बहुसंख्यकवादी राज्यों के समुद्र के बीच बहुलतावादी प्रकाश स्तंभ के रूप में सराहा जाता रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब हमें तेजी से मुस्लिम पाकिस्तान और मुस्लिम बांग्लादेश, या बौद्ध श्रीलंका या बौद्ध म्यांमार के हिंदू संस्करण की तरह देखा जा रहा है- यानी एक ऐसा राज्य जो व्यापक रूप में और कई बार अकेले भी एक धार्मिक बहुसंख्यक के हितों से संचालित है। सरकार इन प्रदर्शनों को लेकर कठोरता से पेश आ रही है, जिससे देश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को ही और आंच आई है। यहां तक कि इस्राइल जैसे मित्र देश ने भी अपने नागरिकों को भारत न जाने की सलाह दी है। गोवा और आगरा में पर्यटन पचास फीसदी तक कम हो गया है।

अतार्किक, अनैतिक और यहां तक कि गलत समय में लाए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम ने भारत की वैश्विक छवि को धक्का पहुंचाया है। और संभवतः प्रधानमंत्री की छवि और उनकी विरासत को भी। मई, 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे, तो अनेक लोग, जिनमें यह लेखक भी शामिल है, उनके द्वारा विदेश नीति को दिए जा रहे असाधारण महत्व को देखकर प्रभावित हुए थे। अपने पहले कार्यकाल में मोदी लगातार दुनिया घूमते रहे, वैश्विक नेताओं के साथ बैठकें करते रहे, दोस्ती बढ़ाते रहे। उनकी कार्रवाइयां और उनके बयान अपने देश को अंतरराष्ट्रीय मामलों में बड़ी ताकत बनाने की उनकी उत्कट इच्छा को दर्शाते थे। ऐसा लगता था कि जवाहरलाल नेहरू के बाद कोई और ऐसा भारतीय प्रधानमंत्री नहीं हुआ, जिसने विदेश नीति में अपनी व्यक्तिगत पूंजी और अपनी ऊर्जा लगाई हो।

ये सारे प्रयास अब एक अकेले ऐसे कानून के कारण निष्प्रभावी और शून्य हो गए हैं, जो कि अनावश्यक होने के साथ ही अविवेकपूर्ण है। इन प्रदर्शनों पर प्रधानमंत्री की खुद की प्रतिक्रियाएं उन्हें ऐसे राजनेता के रूप में प्रदर्शित कर रही हैं, जो खुद से ही सहज नहीं है। सोशल मीडिया में अपने समर्थन में तथाकथित 'संत' का आह्वान करना, प्रदर्शनकारियों से सीएए के बजाय पाकिस्तान की आलोचना करने की मांग करना प्राधिकार या नियंत्रण के संकेत नहीं हैं। प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान हुआ है, मगर उससे अधिक देश को।
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