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समाज को वही कानून मिलता जिसका वह पात्र होता (बिजनेस स्टैंडर्ड)

सोमशेखर सुंदरेशन 
हम असाधारण समय में जी रहे हैं। पिछली बार जब मैं यह स्तंभ लिख रहा था तब प्याज और आर्थिक मंदी कारोबारी और उद्योग जगत की चेतना पर हावी थे। इस पखवाड़े देश के शैक्षणिक संस्थानों में अप्रत्याशित और असाधारण विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। कुछ लोग कहेंगे कि यह देशव्यापी था जबकि अन्य यह भी कह सकते हैं कि देश के 400 विश्वविद्यालयों में से केवल 22 में ऐसा हुआ।

अगर माना जाए कि नागरिकता संशोधन कानून कारोबारी जगत में लागू हो, तो कुछ ऐसा परिदृश्य बनेगा: एक ऐसे कानून की कल्पना कीजिए जिसके तहत कुछ ऐसे उद्योगों को चिह्निïत किया जाए जो कठिनाई से गुजर रहे हों। उदाहरण के लिए दूरसंचार, बिजली और इस्पात। कल्पना कीजिए कि ईंधन कीमतों में ऐसा बदलाव आता है, बिजली क्षेत्र अव्यवहार्य हो जाए, राजस्व साझेदारी की व्याख्याओं में गड़बड़ी की वजह से दूरसंचार क्षेत्र अव्यवहार्य हो जाए और चक्रीय दबाव इस्पात क्षेत्र को अव्यवहार्य बना दें। नागरिकता संशोधन अधिनियम में भी तीन देशों का चयन किया गया है- पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान।

साथ ही यह कल्पना कीजिए कि उद्योगपति कह रहे हैं कि वे दशकों तक भारी-भरकम कर दरों से उत्पीडि़त होते रहे हैं। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रभावी कर दर 90 प्रतिशत से अधिक थी। परंतु कल्पना कीजिए कि कानून ऐसी भीषण राजकोषीय व्यवस्था के कारण उत्पन्न कठिनाइयों और अत्याचार को लेकर खामोश रहा हो और ऐसे उत्पीडऩ की बिना पर इसका बचाव किया जा रहा हो। नागरिकता संशोधन में इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है कि धार्मिक उत्पीडऩ को अवैध प्रवासियों को वैध बताने की वजह माना जाएगा।

अब कानून में ऐसे संशोधन की कल्पना कीजिए जिसके तहत इन तीन उद्योगों में कार्यरत किसी भी व्यक्ति को विधिक दायित्वों से पूरी तरह बरी कर दिया जाए चाहे उसने भारी-भरकम बेनामी संपत्ति जुटा रखी हो या उस पर सरकार का लंबा चौड़ा बकाया हो। नागरिकता संशोधन कानून केवल इन तीन देशों के बारे में कहता है कि इनके अवैध प्रवासियों को अवैध नहीं माना जाएगा।

इसके अलावा कल्पना कीजिए कि उन लोगों को भी विधिक दायित्व से निजात मिलेगी जिनका शायद उन भयंकर कर दरों वाले युग में जन्म भी नहीं हुआ होगा। नागरिकता संशोधन कानून 2014 में सीमा निर्धारित कर रहा है जबकि उसका बचाव सन 1940 के दशक में हुए विभाजन के दौर के अत्याचारों के आधार पर किया जा रहा है। निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि जिन लोगों ने 90 प्रतिशत से अधिक की दर से कर चुकाया और पीडि़त हुए वे अपनी संतानों के लिए कुछ बेहतर नहीं कर पाए और इसलिए उस उत्पीडऩ को सन 1970 के दशक तक सीमित नहीं किया जा सकता।

इसके बाद इस दलील की कल्पना कीजिए कि कानून संवैधानिक है और इसलिए यह एक अच्छा कानून है। यकीनन आय के स्वैच्छिक खुलासे की कई योजनाओं, काले धन की माफी की योजनाओं और ऐसी तमाम योजनाओं को भी संवैधानिक ठहराया गया जिसमें लोग गंगा में डुबकी लगाकर पवित्र हो जाते हैं। सन 1990 के दशक के मध्य में तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से वादा किया था कि बेनामी संपत्ति को इस तरह स्वच्छ बनाने की गतिविधि बंद की जाएगी। परंतु इसके साथ ही यह एक कानूनी सिद्घांत भी है कि राजकोषीय विधान के मसलों में कोई विबंधन नहीं किया जा सकता है। आम आदमी की भाषा में कहें तो कानून बनाने की संप्रभु शक्ति को यह कहकर सीमित नहीं किया जा सकता कि कोई विशिष्टï कानून नहीं बनाया जा सकता। इकलौती चुनौती संवैधानिक मान्यता के स्तर पर सामने आ सकती है।

संवैधानिक वैधता के प्रश्न का उत्तर न्यायपालिका ही दे सकती है।  इसके अलग-अलग हिसाब से कई नतीजे सामने आ सकते हैं। अमेरिका में राष्टï्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कुछ खास मुस्लिम देशों से यात्रियों के अमेरिका आने पर कार्यकारी आदेश के जरिये रोक लगाई। कुछ न्यायाधीशों ने इसे असंवैधानिक बताया जबकि कुछ अन्य ने उसे कानूनी करार दिया। असंवैधानिक ठहराने वालों ने ट्रंप के चुनावी भाषणों का ध्यान रखा जिसमें मुस्लिम देशों से लोगों के आने पर रोक का असंवैधानिक वादा किया गया था। अमेरिकी राष्टï्रपति के विधि अधिकारियों ने यह कहते हुए कानून का बचाव किया कि न्यायाधीशों को भाषणों पर ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि कानून की भाषा को देखना चाहिए। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय दलील से सहमत था। हालांकि यह भी कहना होगा कि ट्रंप ने संवैधानिक लड़ाई जीतने के लिए संशोधित प्रतिबंध आदेश में कुछ गैर मुस्लिम देशों का नाम शामिल किया। भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम कानून खामोशी के साथ किया जा रहा 'धार्मिक उत्पीडऩ' है। अच्छा (संवैधानिक रूप से वैध) कानून और तार्किक कानून (स्वीकार्यता की दृष्टिï से) अलग-अलग हो सकते हैं।

भारत में कारोबारी और उद्योग जगत के लोगों में राष्ट्रवाद की शरण लेने का पुराना रुझान है। ऐसे में यह तुलना ज्ञानवर्धक हो सकती है कि अगर नागरिकता संशोधन कानून कारोबारी जगत में लागू हो तो क्या होगा? जब ढेर सारे बटन एक साथ दबाए जाते हैं। यानी धार्मिक भेद बनाम भाषाई अंतर, आश्रय कानून बनाम नागरिकता कानून, विभाजन युग बनाम सात दशक बाद की राजनीति आदि पर एक साथ बात बहस शुरू होती है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इससे कोई गंभीर बात निकलेगी। हकीकत में समाज में वही कानून बरकरार रहता है जो उसे समझ में आता है। अलोकप्रिय समाज सुधारों का क्रियान्वयन उस समय आसान होता है जब उसके पीछे बाहरी औपनिवेशिक ताकत का दबाव हो। उदाहरण के लिए सती प्रथा पर रोक। एक लोकतांत्रिक देश में वही कानून बनते हैं जिनके हम योग्य होते हैं।

(लेखक अधिवक्ता एवं स्वतंत्र परामर्शदाता हैं)
सौजन्य - बिजनेस स्टैंडर्ड।
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